गुरुवार, 4 नवंबर 2010

जाने कहाँ गये वो दिन...!!!

आज खाली वक़्त में टी.वी.पर चैनल ट्यून करने लगा अचानक ही लगा कि एक हलकी सी झलक पुरानी अदाकारा नर्गिस की देखी है। मैं वहीँ रुक गया, फिल्म का नाम था 'श्री ४२०'। फिर देखने लगा और समझने की कोशिश करने लगा कि भारतीय सिनेमा में क्या अंतर आया है।
जब वो फिल्म देखी तो पहली बार लगा कि अब शायद बोलीवुड मौलिकता खो चुका है। फिल्म एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो उपभोगवादी संस्कृति और धन की चाहत में अपनी मौलिक पहचान भूल जाता है। लेकिन प्यार उसके भीतर की सच्चाई को मरने नहीं देता है। वो वापस फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए व्याकुल हो उठता है। अगर आपको फिल्म की कहानी का अंदाज़ा हो गया है तो खुद ही देखिये की फिल्म का नाम कितना सही रखा गया है।
फिल्म का गीत-संगीत आज भी लोगों की जुबां पर है, आज भी अन्ताक्षरी में इस फिल्म के गीत याद आते हैं।इससे आप फिल्म की मौलिकता का अंदाज़ा आसानी से लगा सकते हैं। मनुष्य कि मनोदशा का सटीक चित्रण करती है यह फिल्म।

पुनः यदि मौलिकता की बात कि जाए तो भारतीय फ़िल्में ही नहीं समाचार जगत भी याद आ जाता है। कभी दस वर्ष पुरानी कोई भी रिपोर्ट इंटरनेट पर देख लीजिये समझ आ जायेगा कि समाचार में मौलिक क्या है। पता नहीं भारतीय मीडिया जगत मौलिकता पर पुनः कब वापस आएगा?
एक बेहतर भविष्य कि उम्मीद के साथ!

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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

जटिलताओं से भरे कूटनीतिक सम्बन्ध


आजकल नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नवम्बर में प्रस्तावित भारत यात्रा की तैयारियों में व्यस्त है दोनों देशों को इस यात्रा से काफी उम्मीदें हैं लेकिन आतंकवाद और आर्थिक मंदी से उत्पन्न हुई नवीन परिस्थितियों ने संबंधों को जटिल बना दिया है

जहां तक आतंकवाद का प्रश्न है, भारत को इसका काफी पुराना अनुभव रहा है लेकिन ९/११ के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका ने सही रूप में पहली बार इस अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का भयानक चेहरा देखा यद्यपि अभी भी अमेरिका, अफगानिस्तान में एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है लेकिन इसमें असफलता के लिए काफी हद तक अमेरिकी नीतियाँ ही जिम्मेदार हैं दो माह पूर्व विक्की लीक्स द्वारा प्रसारित तथ्य इसी ओर इशारा करते हैं सब कुछ जानते हुए अब भी अमेरिकी नीति-नियंता अपनी पुरानी नीतियों को ही अमलीजामा पहनाने में व्यस्त हैं यह सही है कि भारत, अफगानिस्तान में आतंक के खिलाफ चल रहे तथाकथित युद्ध में सीधे रूप से शामिल नहीं है फिर भी अमेरिकी रक्षा नीतियाँ अप्रत्यक्ष रूप से भारत के खिलाफ ही जाती रही हैं अमेरिका, अफगानिस्तान के मोर्चे पर शीत युद्ध के काल से पाकिस्तान को अपना महत्वपूर्ण सहयोगी मानता रहा है लेकिन पाकिस्तान ने अमेरिकी सहायता को सदैव भारत के खिलाफ प्रयोग किया है ओबामा सरकार ने अपनी नई अफ-पाक नीति में साफ़ तौर पर यह घोषणा की है कि अमेरिका पाकिस्तान को अफगानिस्तान के मोर्चे पर सहायता प्रदान करने के एवज में लगभग डेड़ अरब डॉलर की प्रतिवर्ष सहायता देगा भारत इस विषय पर कई बार अपनी चिंताएं अमेरिका से जाहिर कर चुका है कि इस सहायता राशि का प्रयोग भारत में आतंक फैलाने में किया जाता है , इसके विपरीत अमेरिका भारतीय क्षेत्र में फैले हुए आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाने के बजाय भारत पर ही अपनी पश्चिमी सीमाओं और कश्मीर से सेना में कमी करने का दवाब बनाता रहता है विक्की लीक्स के खुलासों के बाद ओबामा का भारत दौरा भारतीय सरकार द्वारा अमेरिका पर अपनी अफ-पाक नीति की पुनः समीक्षा करने का दवाब बनाने का अच्छा मौका हो सकता है परन्तु यह भारत सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति पर ही निर्भर करता है

दूसरी ओर भारत को पिछले काफी समय से यह उम्मीद है कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थाई सदस्यता का समर्थन करे जबकि ओबामा सरकार अपने कार्यकाल के प्रारंभ से ही भारत पर परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने का दवाब बना रही है

यदि इन कूटनीतिक मुद्दों को वर्तमान द्विपक्षीय संबंधों से एक बारगी अलग भी रखा जाए तब भी भारत-अमेरिका के आर्थिक एवं द्विपक्षीय व्यापारिक सम्बन्ध महत्वपूर्ण हैं अमेरिका और पश्चिमी देश अभी भी २००८-०९ की आर्थिक मंदी से पूरी तरह से उबार नहीं पाए हैं हालांकि भारत इससे अछूता नहीं है लेकिन भारत के बड़े घरेलू बाज़ार, सरकार की मौद्रिक नीतियों एवं धन प्रवाह पर मज़बूत पकड़ ने मंदी के प्रभाव को कम अवश्य किया है अमेरिका को मंदी की इस स्थिति से उबरने के लिए भारत का बड़ा बाज़ार दिखाई दे रहा है जहां वह अपनी वस्तुओं एवं सेवाओं को खपा सकता है, इस नज़रिए से भी इस समय भारत, अमेरिका की नज़रों में महत्वपूर्ण बन जाता है लेकिन इस मामले में विश्व व्यापार संगठन(डब्ल्यू.टी.ओ.) में भारत और अमेरिका के बीच के विवाद बने हुए हैं एक ओर अमेरिका चाहता है कि भारत अपना घरेलू बाज़ार कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के लिए खोल दे वहीँ दूसरी ओर आर्थिक मंदी के बाद अमेरिका एवं अन्य पश्चिमी देशों ने अपना बाज़ार लगभग बंद कर दिया इसके साथ ही इन देशों ने अपनी नई वीजा और कर नीतियों से भारतीय कामगारों के लिए राह कठिन कर दी है भारत चाहता है कि अमेरिका पहले अपनी कृषि पर सब्सिडी को कम करे साथ ही वीजा नियमों को भी कुछ नरम करे, लेकिन इस मुद्दे पर अभी दोनों देशों में मतभिन्नता है

सही मायने में देखा जाए तो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका, भारत को अपने एक मज़बूत सहयोगी के रूप में रखना चाहता है क्योंकि अब विश्व एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय होने कि ओर अग्रसर है चीन और रूस पुनः विश्व में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, इसके साथ में बाजील-रूस-भारत-चीन(ब्रिक), भारत-ब्राज़ील-दक्षिण अफ्रीका(इब्सा), रूस-चीन-भारत(रिक) जैसे व्यापारिक संगठन न केवल आर्थिक रूप से बल्कि कूटनीतिक रूप से भी विश्व को बहुध्रुवीय बनाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं ऐसे में अमेरिका को भारत के रूप में शांतिपूर्ण, तीव्र प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक सहयोगी की अपेक्षा है इसीलिये अमेरिका ने भारत को असैन्य परमाणु समझोते और नवीन हथियार प्रौद्योगिकी बेचने में दिलचस्पी दिखाई है जिससे एक ओर एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित होता है वहीँ दूसरी ओर अमेरिका के भारत से सैन्य सम्बन्ध भी मज़बूत हो रहे हैं

लेकिन केवल मज़बूत संबंधों से ही भारत की अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, ओबामा का दौरा नई-दिल्ली के लिए एक मौका है जिसमे वह वाशिंगटन डी.सी. के सामने पर्यावरणिक मुद्दों, बौद्धिक सम्पदा अधिकार आदि पर अपने पक्ष मज़बूत कर सकती है क्यों की मंदी के बाद अमेरिका काफी हद तक बैकफुट पर है लेकिन इसका अर्थ यह बिलकुल भी नहीं कि सिर्फ अमेरिका को ही भारत की आवश्यकता है भारत को तीव्र विकास बनाए रखने के लिए अमेरिका जैसे बड़े पूंजीवादी देश की आवश्यकता है इसके अतिरिक्त भारत अभी भी चीन की विस्तारवादी नीतियों से आशंकित है जो उसे अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश का महत्वपूर्ण सहयोगी बनने पर मजबूर कर रहा है

सारांश के रूप में, वर्त्तमान समय में भारत और अमेरिका दोनों देशों को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, विश्वव्यापी आर्थिक मंदी, पर्यावरण संरक्षण, विश्व व्यापर संगठन में समन्वय एवं परमाणु निरस्त्रीकरण जैसे मुद्दों से मिलकर निबटने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए परन्तु इन समस्याओं को सुलझाने की युक्तियों पर दोनों देशों में मतभिन्नता भी है, साथ ही साथ विश्व राजनीति का भी द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव पड़ता है बहरहाल बराक ओबामा की आगामी भारत यात्रा पर दोनों देश एक-दूसरे से काफी कुछ उम्मीदें पाले बैठे हैं लेकिन अभी एक लम्बा रास्ता तय करना बाकी है

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गुरुवार, 12 अगस्त 2010

निजता बनाम सुरक्षा. मगर कैसी?

आज कल ब्लैकबेरी फोन और उसे बनाने वाली कंपनी रिसर्च इन मोशन काफी चर्चा में है। भारत सरकार का कहना है कि कंपनी को वे सभी गुप्त ई-मेल सन्देश सुरक्षा एजेंसियों को मुहैया कराने होंगे जो पकड़ से बाहर हैं।
इस मुद्दे पर समाज में भी अच्छी खासी बहस चल रही है कि क्या सरकार को इस प्रकार किसी व्यक्ति की निजता का हनन करना चाहिए?
अभी हाल ही में एक हिंदी दैनिक के राष्ट्रीय संस्करण में एक वरिष्ठ पत्रकार जिनका एक प्रोडक्शन हाऊस भी है, का एक लेख पढ़ा। लेखक का मानना है कि सरकार सुरक्षा के नाम पर लोगों की प्राइवेसी में दखल दे रही है। इसके लिए पत्रकार महोदय ने तर्क प्रस्तुत किया कि
  1. ब्लैकबेरी अधिकाँशतःयुवा वर्ग प्रयोग करता है अथवा बड़े उद्योगपति,
  2. आज तक किसी भी आतंकवादी के पास से ब्लैकबेरी फोन बरामद नहीं हुआ है, बल्कि वे लोग तो उपग्रह फोन अथवा इंटरनेट टेलीफोनी का प्रयोग करते हैं,
  3. इसके ज़रिये सरकारी अफसर सिर्फ लोगों को परेशान ही करेगे।

मेरा मानना है कि , सरकार इस कदम से लोगों की निजता भंग कर सकती है लेकिन,
  1. क्या मुठ्ठीभर लोगों के लिए करोड़ों लोगों की जान दांव पर लगाईं जा सकती है?
  2. क्या ये मान लिया जाए कि आतंकवादियों को ब्लैकबेरी जैसी सस्ती और आसान सुविधा की जानकारी नहीं है?
  3. क्या अभी भी सरकारी अफसर हमारे ध्वनि मैसेज और एस.एम्.एस. पर नज़र रखते हुए हमें परेशान करते हैं?

बात सीधी है, जो कंपनी अमेरिका की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए वहां अपने सर्वर स्थापित कर सकती है वही काम वह भारत में क्यों नहीं कर सकती?
आज विश्व के कई देश ब्लैकबेरी की सेवाओं को प्रतिबंधित करने की सोच रहे हैं। इन देशों में संयुक्त अरब अमीरात, सउदी अरब, इंडोनेशिया आदि देश शामिल हैं।

तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है,
आज ही , पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़(पीयूसीएल) की याचिका पर उच्चतम न्यायलय ने सरकार को आदेश दिया है कि उचित देख रेख के आभाव में सड़ रहे अनाज को गरीबों में बाँट दिया जाये।
साथ ही, केंद्रीय गृह मंत्री ने संसद में बयान दिया कि भोपाल गैस त्रासदी के मामले में सभी सरकारों तथा न्यायपालिका ने उचित ध्यान नहीं दिया, अब जो हो चुका है उसे याद न करते हुए आगे की सोचते हैं।

इन दोनों उदाहरणों से पता चलता है कि भारत के नागरिकों को मारने के लिए आतंकवादियों की ज़रुरत ही नहीं है, सरकार की निष्क्रियता ही काफी है।
बेहतर होगा कि सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए केवल ब्लैकबेरी पर प्रतिबन्ध का सहारा न ले। क्यों कि गरीब के लिए गरीबी और भूख से बड़ा आतंक कोई नहीं है।

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गुरुवार, 17 जून 2010

प्रथम अनुभव

आज मैं पहली बार एक वास्तविक क्राइम स्टोरी को कवर करने के लिए अपने सीनिअर रिपोर्टर के साथ गया। यह शहर में घटित एक सांप्रदायिक तनाव था। दरअसल नगर के एक मिश्रित आबादी वाले इलाके में एक दिन पूर्व ही कुछ नवयुवकों में मारपीट हो गयी थी। अगले दिन सुबह एक समुदाय के कुछ राजनीतिक नेतागण पधारे और उन्होंने दूसरे समुदाय के लोगों के खिलाफ लोगों को भड़काया और बाज़ार बंद करके जाम लगवा दिया। जब पुलिस आई तो पहले समुदाय ने दूसरे समुदाय के लोगों के खिलाफ नामज़द तहरीर दी।
इधर जब दूसरे समुदाय के पास यह खबर पहुँची तो वे भी भड़क गए और उन्होंने भी एक मार्ग पर पर जाम लगा दिया। तब पुलिस ने हरकत में आते हुए तुरंत अतिरिक्त पुलिस बल को इलाके में तैनात किया।
शाम के समय तक इलाके का बाज़ार बंद रहा लेकिन तनावपूर्ण शांति बनी रही। रात के आठ बजे पुनः कुछ युवकों के बीच मार-पीट की खबर आई तब मैं और मेरे सीनियर रिपोर्टर मौके पर पहुंचे। वहां काफी संख्या में आक्रोशित लोगों भीड़ थी जो कि घटना का विरोध करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग कर रही थी।
चूँकि मैं पहली बार ऐसे माहौल में गया था इसलिए मेरे सीनियर ने मुझे कुछ आवश्यक नसीहत देते हुए अपने साथ आगे लिया। वहां पर पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि कैसे कोई साधारण घटना राजनीति के द्वारा सांप्रदायिक रूप ले लेती है।
मैंने देखा कि यदि उस इलाके में पुलिस बल मौजूद न हो तो मामला काफी गंभीर बन सकता है। प्रश्न यह नहीं है कि गलती किसकी है क्योंकि गली मोहल्लों में ऐसी घटनाएं अक्सर होती हैं, लेकिन एक ऐसे इलाके में जो कि अपेक्षाकृत हमेशा शांत रहता है वहां केवल नेतागीरी की वजह से एक अच्छा खासा सांप्रदायिक तनाव बन गया है।
मैंने जिस तरह से इलाके में मामले की पड़ताल की, उस पर मेरे सीनियर रिपोर्टर ने मेरे साहस कि प्रशंसा की। मेरे लिए यह एक चौकाने वाला अनुभव था लेकिन शायद आज ही सही मायने में मेने महसूस किया कि एक क्राइम रिपोर्टर कि जिंदगी क्या होती है।
अंत में , मैं अपने सीनियर रिपोर्टर और अपने एडिटर साहब को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने मुझे ऐसे नाज़ुक मौके पर घटनास्थल पर जाने कि इजाज़त दी।

बुधवार, 16 जून 2010

शर्मनाक

भोपाल गैस त्रासदी का जिन्न पुनः बोतल से बाहर आ गया है।हमेशा की तरह फिर से भारतीय राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर जारी हो गया है। देश के दोनों प्रमुख दल एक-दूसरे को जनता का अधिक हितैषी जताने के लिए प्रयासरत हैं। और बेचारे पीड़ित अभी भी अपनी आँखों से मिथाइल -आइसो साइनेट के खूनी आंसू रो रहे हैं।
वो तो भला हो आज की हाई स्पीड मीडिया का जो इतने सालों बाद पुनः मामले की छानबीन करने पर उतारू है। परत दर परत ये भेद खुलते जा रहे हैं कि राजनीति ने उसी जनता की किस प्रकार अवहेलना की है जो कि लोकतंत्र में राजनीति का आधार है।आखिर जिस जनता ने वोट दिया उसके प्रति जवाबदेही किसकी बनती है?
क्या अब पुनः सरकार के द्वारा मुआवजा देकर भोपाल की जनता को पूर्ण न्याय मिल पायेगा? क्या यही है हमारा लोकतंत्र जो स्वयं को समता और न्याय पर आधारित बताता है?
आपकी टिप्पणियां सहर्ष आमंत्रित हैं।

मंगलवार, 15 जून 2010

राज ठाकरे के जन्मदिन पर अनोखा तोहफा

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने राज ठाकरे को उनके जन्म दिन पर एक खुश करने वाला तोहफा दिया है। मनसे कार्यकर्ताओं ने पुणे में बिहारी मजदूरों पर हमले किये हैं साथ ही कंपनी मालिकों को भी धमकी दी गयी है कि वे उत्तर प्रदेश और बिहार से आये मजदूरों को नौकरी से निकाल दें। यह घटना १४ जून की है।
महाराष्ट्र में ऐसी घटनाएँ पिछले काफी समय से घटित हो रही हैं। ये घटनाएँ भारत की विभाजनकारी राजनीति का ही दर्पण हैं।

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

यहाँ विचारों की स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं.

हमारे पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर साहब को भारत आने से पहले इस बात को अच्छी तरह जान लेना था कि भारत न तो यूरोप है न ही अमरीका जो खुल के कभी भी जब चाहा ब्लॉग पर अपने विचार लोगों से बाँट लिए। भैये! ये तो भारत है जहां विचार अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता सिर्फ संविधान में ही विचरण करती है थरूर अभी भी यही सोच रहे होंगे कि अगर अपना इस्तीफ़ा भी ट्विट्टर पे दिया होता तो शायद ज्यादा ठीक रहता। आखिरकार कांग्रेस ने अपने इस तथाकथित बिगडेल बच्चे के कान उमेठ ही दिए।
और जिसका डर था वो भी हुआ , आखिरकार आई पी एल भारत कि राजनीती पर हावी हो ही गया। संसद में मुद्दों कि कमी हो गयी और हंगामा हुआ उसी आई पी एल की वजह से। अब मोदी साहब ! आप की बारी है तैयार हो जाइये क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ संविधान में ही है।

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

महंगा पड़ा मोदी को

इसे कहते हैं कुर्सी की ताकत। आपके विचार मोदी और थरूर के बारे में भिन्न हो सकते हैं लेकिन ये बात तो तय है की थरूर ने ये तो दुनिया को जता ही दिया कि जो आदमी सरकार में हो उससे पंगा मत लो। चलो भैया, मोदी के पास तो पैसा भी है, आम आदमी का क्या? आज भारत का हर आम आदमी ये समझ ले कि जो कुर्सी पर बैठा हो उससे कुछ मत बोलो वरना अंजाम बुरा होगा।

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

उसको भुला दिया

अब किसको दोष देगा ये भारतीय समाज? एक ज़माना बीत गया उस शख्सियत को हमारे बीच से गए जिसने समाज में समानता का सपना देखा था। जिसने दबे कुचले लोगों के लिए आवाज़ बुलंद की थी, जिसने एक पिछड़े हुए समाज को फिर से सपने दिखाए , उन्हें आशाओं के पंख दिए। सबने सोचा ये ही है वो मसीहा जो इस समाज को जातिवाद के दलदल से निकालेगा लेकिन भारतीय समाज के क्या कहने , उसको न केवल भुला दिया बल्कि गलत भी ठहरा दिया।
आज बाबा साहब अम्बेडकर केवल मूर्तियों में जिंदा हैं और उनका सपना अभी भारतीय राजनीती की गन्दी नालियों में आखिरी सांस लेता नज़र आ रहा है।
अब बताइये दोष किसका अंग्रेजों की 'फूट डालो राज करो ' की नीति का या 'हमारा' ???