बुधवार, 30 मार्च 2011

तीरंदाज़




कौन है वो तीरंदाज़ 
क्या आप हैं ,या मैं हूँ, कहीं वो तो नहीं
जो सामने अपने लक्ष्य को लिए, भेद रहा है जिंदगियों को|

सुनो सुनाता हूँ बात एक पते की,
जब था एक राजा तीरंदाज़,
जिसका था निराला ही अंदाज़,
बोला ये दुनियां है मेरा आशियाना,
लकिन दुनिया ने कहा,
ये है हमारा नक्कारखाना,
तब राजा बोला मानो मेरी बात, नहीं तो मिलेगी तुम्हे सजा , अबू-गारिब में कटेगी तुम्हारी रात|
 जगमगाता  है मेरा यह  महल तेल के दीयों से, जो निकलता है तुम्हारे खून पसीनों से|
दुनिया ने नहीं मानी बात, राजा बोला अब झेलो लात घूसों के साथ बमों की बरसात|
तब जनता तड़प कर बोली ये है तेरा चौपट राज,
तब राजा बोला प्यारे तू नहीं समझेगा ये है मानवाधिकारों की बात|


तब पूरब में एक बेचारा बोला,
बंद करो-बंद करो काटना ये जंगल,  नरमुंड और हाथ,
रहने दो इन्हें जंगलों में ये है जन्मों का साथ|
राजा ने बेचारे से कहा चुप रह मक्कार, नहीं बचेगी तेरी गर्दन ये है आम आदमी का हाथ|

भूखे पेट पर हाथ रखे जनता लगी कसमसाने, 
बोली यूँ ना पूछो मेरी जात गिनती के बहाने|
तब राजा पेट पर हाथ फिरा कर बोला, स्विस बैंक में जमा है तेरी सौगात,
जनता का तो काम ही है मरना, क्या है तेरी औकात|

तब जनता ने उठाया तीर-कमान और कहा,
राजा याद रख लोकतंत्र की बात,
यहाँ पर तू नहीं मैं ही हूँ वो तीरंदाज़, मैं ही हूँ वो तीरंदाज़|| 


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