बहुप्रतीक्षित स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस या लाईट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट भारतीय वायुसेना में जोर शोर के साथ प्रारंभिक रूप से शामिल हो गया| भारतीय मीडिया जगत गर्व से कह रहा है कि भारत भी उन चुनिन्दा देशों की श्रेणी में आ गया है जो कि चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित कर सकते हैं| लेकिन क्या वास्तव में हम वो हासिल कर पाए हैं जो कि हमें चाहिए था? इस पर कुछ तथ्यात्मक और तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं|
ऐसा कहा जा रहा है कि तेजस, भारतीय वायु सेना के पुराने पड़ चुके मिग-२१ और मिग-२७ विमानों की जगह लेगा| मिग-२१ जो कि एक रूसी विमान है, वायु सेना का मुख्य युद्धक विमान है| यह विमान रूसी वायुसेना से वर्षों पहले हटाया जा चुका है लेकिन भारतीय वायुसेना अभी भी इससे अपना काम चला रही है| इसी क्रम में, भारतीय वायुसेना १२६ मल्टीरोल(बहुद्देश्यीय) लड़ाकू विमानों कि खरीद के लिए अभी निविदाएँ आमंत्रित कर रही है| आखिर तेजस के विकास कार्यक्रम के लगभग पूरा होने के बावजूद भी भारतीय वायुसेना चौथी पीढ़ी के ही विदेशी लड़ाकू विमान क्यों लेना चाहती है? क्या तेजस की हालत भी अर्जुन टैंक की तरह होने वाली है जिसे सेना ने अनमने ढंग से ही लिया है|
तेजस का विकास १९८३ से प्रारंभ हुआ था जोकि अभी पूरा नहीं हुआ है| इस विकास प्रक्रिया में लगभग १४००० करोड़ रुपये की लागत आयी है| तेजस अभी भी विदेशी इंजन से चल रहा है क्योंकि स्वदेशी कावेरी इंजन सफल नहीं है और तेजस की आवश्यकताएं पूरी नहीं करता| तेजस का रडार विदेशी है जोकि लड़ाकू विमान का एक आवश्यक अंग है| तेजस की तुलना दुनिया के आधुनिकतम चौथी पीढ़ी के विमानों से की जा रही है लेकिन क्या यह यूरोफाइटर, ग्रिपन, ऍफ़-१८, ऍफ़-१६, जे ऍफ़-14 और सुखोई-३० से कर सकता है? जवाब सीधा है 'नहीं', तो आखिर इतना हो हल्ला क्यों?
इस समय सुखोई-३० एम्.के.आई. विश्व का बेहतरीन चौथी पीढ़ी का युद्धक विमान है जिससे आगे सिर्फ अमेरिका का पांचवी पीढ़ी का विमान ऍफ़-२२ रैप्टर ही है, ऐसे में भारतीय मीडिया का तेजस की तुलना सुखोई से करना कितना न्यायसंगत है| सुखोई की कीमत लगभग २४० करोड़ रुपये है जबकि तेजस लगभग १५० करोड़ रुपये में बन कर तैयार होगा| लेकिन सुखोई की तरह तेजस को अग्रिम पंक्ति का युद्धक विमान बनाने के लिए वायु सेना भी शायद तैयार नहीं है| ऐसे में जबकि पकिस्तान के पास अमेरिकी और चीनी चौथी पीढ़ी के विमान हैं साथ ही चीन भी पांचवी पीढ़ी का युद्धक विमान बनाने के करीब है, तेजस को मुख्य युद्धक विमान कैसे बनाया जा सकता है?
कुछ सकारात्मक तथ्य भी हैं; नहीं तो आप कहेंगे कि ये शख्स केवल नकारात्मक बातें ही करता है| तेजस का एयरफ्रेम और फ्लाई बाई वायर तकनीक भारत ने स्वयं विकसित किया है जोकि एक वैज्ञानिक उपलब्धि है| तेजस के आने से दशकों पुराने मिग विमानों जोकि आजकल उड़नताबूत कहे जाते हैं से वायुसेना को छुटकारा मिलने वाला है| कुछ मामलों में तेजस मिग श्रेणी के विमानों से काफी उन्नत है| विदेशी विमानों की खरीद में जाने वाले धन की बचत होगी| साथ ही भारत भी रूस के सहयोग से पांचवी पीढ़ी का युद्धक विमान विकसित कर रहा है|
अंततः मुद्दे की बात, भारतीय योजनायें चाहे किसी भी क्षेत्र क्यों न हों अपनी लेट-लतीफ़ी और लालफीताशाही के कारण न केवल महँगी हो जाती हैं बल्कि समय के साथ अप्रासंगिक भी हो जाती हैं| हमारे नीति निर्माताओं को ये समझना चाहिए कि देश का विकास और जनता का धन अमूल्य है|
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं|
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