क्या फर्क पड़ता है
मैंने अशोक को दस रुपये दिए तो उसने मुझसे पूछा कि भाई क्या आप पत्रकार हैं? मैंने कहा.. नहीं.....मैं बेकार हूं।
यह बड़ा ही निराशाजनक और नकारात्मक शीर्षक है लेकिन लगता तो ऐसा ही है। दरअसल हम अपने आम जीवन में झांक कर देखें तो पता चलेगा कि एकदम सटीक शीर्षक है कि क्या फर्क पड़ता है।
" उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से समाजवादी पार्टी की सरकार बनीं क्या फर्क पड़ा, पेट्रोल के दाम 7 रुपये से ज्यादा बढ़ाए गए क्या फर्क पड़ा.......... हमारी कोई नहीं सुनता, हमें तो रोज काम करना और पैसा कमाना है।"
अपने शहर आगरा में बाहर निकला सोचा एक दोस्त से मिलकर आता हूं। चौराहे पर पहुंचा और एक ऑटो वाले से पूछा सिकंदरा चौराहे तक जाने का क्या लोगे? तो बोला 10 रुपये। मैंने कहा कि भाई 5 रुपये ही दिये थे थोड़े दिन पहले अब 10 क्यों ले रहे हो। वैसे आगरा शहर में ऑटो वाले बड़े बदनाम हैं। कहा जाता है कि गुंडागर्दी करते हैं, मनमाना पैसा वसूलते हैं, शहर के ट्रैफिक के लिए समस्या खड़ी करते हैं औऱ न जाने क्या क्या। हालांकि काफी हद तक ये सारी बातें सही भी हैं और इसके बारे में रोज शहर के अखबारों के लोकल पेज में कोई न कोई समाचार जरूर निकलता है। मैंने ऑटो वाले से कहा कि एक तो वैसे ही तुम लोगों की इमेज अच्छी नहीं है ऊपर से रही सही कसर तुम लोग ज्यादा किराया वसूल कर के निकाल देते हो। उसका ऑटो भर चुका था फिर उसने अपने ही बराबर में आगे लटकने के लिए जगह दी और मैं भी उसी ऑटो में सवार हो गया। तब रास्ते में उस ऑटो वाले ने एक पूरी कहानी सुना दी...।
ऑटो वाले ने अपना नाम अशोक बताया और वह अनुसूचित जाति से संबंधित था। अशोक ने बताया कि एक साल पहले तक वह जूता फैक्ट्री में काम करता था लेकिन वहां कम पैसा मिलने के कारण उसने नौकरी छोड़ दी। फिर किराए पर ऑटो चलाना शुरू कर दिया। अशोक के मुताबिक, ऑटो के मालिक को एक दिन का 350 रुपये किराया देना पड़ता है। फिर दिन के दो घंटे तो सीएनजी के लिए लाइन में खड़े खड़े ही गुजर जाते हैं। खंदारी चौराहे पर बोला कि ट्रैफिक पुलिस वालों को देख रहे हो, ये लोग या तो 300 रुपये का चालान काटते हैं या फिर 100-150 रुपये में छोड़ देते हैं। इनको भी देने ही पड़ते हैं फिर 50 से 100 रुपये तक ठेकेदार ले जाता है। कुल मिलाकर अशोक ने बताया कि लगभग 300 रुपये वो रोज़ बचा पाता है। मैंने कहा कि इससे ज्यादा तो साइकिल रिक्शा वाला कमा लेता है। वो बोला कि गर्मी के मौसम में साइकिल रिक्शा चलाने की हिम्मत नहीं होती साथ ही और साथी भी ऑटो ही चलाते थे इसलिए ये ही काम शुरू किया। मैंने अशोक से फिर पूछना शुरू किया कि ठेकेदार किस बात के पैसे लेता है। अशोक बोला कि ये पैसे तो केवल ऑटो चलाने के हैं अगर नहीं दिए तो चौराहे पर खड़ा ही नहीं होने देते। लेकिन चौराहे पर पार्किंग के इतने पैसे कुछ समझ में नहीं आए। कुछ ही देर में मुझे पता चल चुका था कि मैंने अशोक की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।
अशोक ने बताया कि ये कोई पार्किंग का टैक्स नहीं है ये तो गुंडागर्दी है जो पुलिस और प्रशासन की देख रेख में आगरा की सड़कों पर चलती है। अशोक ने बताया कि कुछ लोग हैं जो मिलकर ये गुंडागर्दी करते हैं। इन चार-पांच लोगों ने आगरा कुछ भागों में नगर निगम के पार्किंग के ठेके ले रखे हैं और उसके अलावा ऑटो वालों से गुंडा टैक्स भी वसूल करते हैं। उसने बताया कि पैसा नहीं देने पर इनके लोग चौराहे से तो भगा ही देते हैं ऊपर से मारपीट भी करते हैं। मैंने कहा कि पुलिस वाले तब कुछ नहीं बोलते तो अशोक बोला कि बैठते तो ये पुलिस वालों के साथ ही हैं फिर पुलिस वाले भी कुछ क्यों बोलने लगे। अब जरा सोचिए कि आगरा में ट्रैफिक के लिए समस्या बनने वाले ये ऑटो सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों की संख्या में हैं तो रोजाना कि इस गुंडा टैक्स से कितनी बड़ी अवैध वसूली खुले आम चल रही है।
अशोक से पूछने के लिए अब काफी सारे सवाल खड़े हो रहे थे। मैंने कहा कि कब से चल रही है ये वसूली तो उसने बताया कि ये तो हमेशा से चल रही है। मैंने कहा कि क्या सरकार के बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ा, क्या उसके बाद ठेकेदार भी नहीं बदला तो उसने बताया कि बसपा की सरकार हो या सपा की इन ठेकेदारों की गुंडागर्दी हमेशा से चल रही है औऱ चलती ही रहेगी। अजूबे की बात तो ये है कि ऑटो वालों के बारे में काफी सारी बातें यहां के अखबारों में निकलती हैं लेकिन इस अवैध वसूली के बारे में किसी अखबार ने आज तक कुछ भी नहीं छापा है। अब बताइये, आम मेहनतकश आदमी के ऊपर क्या फर्क पड़ता है। इसे सकारात्मक रूप में लीजिए... कोई मेहनत करके अपने बच्चे पालने की कोशिश कर रहा है लेकिन फिर भी उसकी मेहनत को प्रशासन औऱ गुंडे खा रहे हैं... ये फर्क पड़ता है। बाकी हमारे, आपके, नेता, अफसर और अखबार वालों के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता।
उतरते समय मैंने अशोक को दस रुपये दिए तो उसने मुझसे पूछा कि भाई क्या आप पत्रकार हैं? मैंने कहा.. नहीं.....मैं बेकार हूं।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
------------------------------आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं---------------------------------
मैंने अशोक को दस रुपये दिए तो उसने मुझसे पूछा कि भाई क्या आप पत्रकार हैं? मैंने कहा.. नहीं.....मैं बेकार हूं।
यह बड़ा ही निराशाजनक और नकारात्मक शीर्षक है लेकिन लगता तो ऐसा ही है। दरअसल हम अपने आम जीवन में झांक कर देखें तो पता चलेगा कि एकदम सटीक शीर्षक है कि क्या फर्क पड़ता है।
" उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से समाजवादी पार्टी की सरकार बनीं क्या फर्क पड़ा, पेट्रोल के दाम 7 रुपये से ज्यादा बढ़ाए गए क्या फर्क पड़ा.......... हमारी कोई नहीं सुनता, हमें तो रोज काम करना और पैसा कमाना है।"
अपने शहर आगरा में बाहर निकला सोचा एक दोस्त से मिलकर आता हूं। चौराहे पर पहुंचा और एक ऑटो वाले से पूछा सिकंदरा चौराहे तक जाने का क्या लोगे? तो बोला 10 रुपये। मैंने कहा कि भाई 5 रुपये ही दिये थे थोड़े दिन पहले अब 10 क्यों ले रहे हो। वैसे आगरा शहर में ऑटो वाले बड़े बदनाम हैं। कहा जाता है कि गुंडागर्दी करते हैं, मनमाना पैसा वसूलते हैं, शहर के ट्रैफिक के लिए समस्या खड़ी करते हैं औऱ न जाने क्या क्या। हालांकि काफी हद तक ये सारी बातें सही भी हैं और इसके बारे में रोज शहर के अखबारों के लोकल पेज में कोई न कोई समाचार जरूर निकलता है। मैंने ऑटो वाले से कहा कि एक तो वैसे ही तुम लोगों की इमेज अच्छी नहीं है ऊपर से रही सही कसर तुम लोग ज्यादा किराया वसूल कर के निकाल देते हो। उसका ऑटो भर चुका था फिर उसने अपने ही बराबर में आगे लटकने के लिए जगह दी और मैं भी उसी ऑटो में सवार हो गया। तब रास्ते में उस ऑटो वाले ने एक पूरी कहानी सुना दी...।
ऑटो वाले ने अपना नाम अशोक बताया और वह अनुसूचित जाति से संबंधित था। अशोक ने बताया कि एक साल पहले तक वह जूता फैक्ट्री में काम करता था लेकिन वहां कम पैसा मिलने के कारण उसने नौकरी छोड़ दी। फिर किराए पर ऑटो चलाना शुरू कर दिया। अशोक के मुताबिक, ऑटो के मालिक को एक दिन का 350 रुपये किराया देना पड़ता है। फिर दिन के दो घंटे तो सीएनजी के लिए लाइन में खड़े खड़े ही गुजर जाते हैं। खंदारी चौराहे पर बोला कि ट्रैफिक पुलिस वालों को देख रहे हो, ये लोग या तो 300 रुपये का चालान काटते हैं या फिर 100-150 रुपये में छोड़ देते हैं। इनको भी देने ही पड़ते हैं फिर 50 से 100 रुपये तक ठेकेदार ले जाता है। कुल मिलाकर अशोक ने बताया कि लगभग 300 रुपये वो रोज़ बचा पाता है। मैंने कहा कि इससे ज्यादा तो साइकिल रिक्शा वाला कमा लेता है। वो बोला कि गर्मी के मौसम में साइकिल रिक्शा चलाने की हिम्मत नहीं होती साथ ही और साथी भी ऑटो ही चलाते थे इसलिए ये ही काम शुरू किया। मैंने अशोक से फिर पूछना शुरू किया कि ठेकेदार किस बात के पैसे लेता है। अशोक बोला कि ये पैसे तो केवल ऑटो चलाने के हैं अगर नहीं दिए तो चौराहे पर खड़ा ही नहीं होने देते। लेकिन चौराहे पर पार्किंग के इतने पैसे कुछ समझ में नहीं आए। कुछ ही देर में मुझे पता चल चुका था कि मैंने अशोक की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।
अशोक ने बताया कि ये कोई पार्किंग का टैक्स नहीं है ये तो गुंडागर्दी है जो पुलिस और प्रशासन की देख रेख में आगरा की सड़कों पर चलती है। अशोक ने बताया कि कुछ लोग हैं जो मिलकर ये गुंडागर्दी करते हैं। इन चार-पांच लोगों ने आगरा कुछ भागों में नगर निगम के पार्किंग के ठेके ले रखे हैं और उसके अलावा ऑटो वालों से गुंडा टैक्स भी वसूल करते हैं। उसने बताया कि पैसा नहीं देने पर इनके लोग चौराहे से तो भगा ही देते हैं ऊपर से मारपीट भी करते हैं। मैंने कहा कि पुलिस वाले तब कुछ नहीं बोलते तो अशोक बोला कि बैठते तो ये पुलिस वालों के साथ ही हैं फिर पुलिस वाले भी कुछ क्यों बोलने लगे। अब जरा सोचिए कि आगरा में ट्रैफिक के लिए समस्या बनने वाले ये ऑटो सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों की संख्या में हैं तो रोजाना कि इस गुंडा टैक्स से कितनी बड़ी अवैध वसूली खुले आम चल रही है।
अशोक से पूछने के लिए अब काफी सारे सवाल खड़े हो रहे थे। मैंने कहा कि कब से चल रही है ये वसूली तो उसने बताया कि ये तो हमेशा से चल रही है। मैंने कहा कि क्या सरकार के बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ा, क्या उसके बाद ठेकेदार भी नहीं बदला तो उसने बताया कि बसपा की सरकार हो या सपा की इन ठेकेदारों की गुंडागर्दी हमेशा से चल रही है औऱ चलती ही रहेगी। अजूबे की बात तो ये है कि ऑटो वालों के बारे में काफी सारी बातें यहां के अखबारों में निकलती हैं लेकिन इस अवैध वसूली के बारे में किसी अखबार ने आज तक कुछ भी नहीं छापा है। अब बताइये, आम मेहनतकश आदमी के ऊपर क्या फर्क पड़ता है। इसे सकारात्मक रूप में लीजिए... कोई मेहनत करके अपने बच्चे पालने की कोशिश कर रहा है लेकिन फिर भी उसकी मेहनत को प्रशासन औऱ गुंडे खा रहे हैं... ये फर्क पड़ता है। बाकी हमारे, आपके, नेता, अफसर और अखबार वालों के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता।
उतरते समय मैंने अशोक को दस रुपये दिए तो उसने मुझसे पूछा कि भाई क्या आप पत्रकार हैं? मैंने कहा.. नहीं.....मैं बेकार हूं।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
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