जटिलताओं से भरे कूटनीतिक सम्बन्ध
आजकल नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नवम्बर में प्रस्तावित भारत यात्रा की तैयारियों में व्यस्त है दोनों देशों को इस यात्रा से काफी उम्मीदें हैं लेकिन आतंकवाद और आर्थिक मंदी से उत्पन्न हुई नवीन परिस्थितियों ने संबंधों को जटिल बना दिया है
जहां तक आतंकवाद का प्रश्न है, भारत को इसका काफी पुराना अनुभव रहा है लेकिन ९/११ के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका ने सही रूप में पहली बार इस अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का भयानक चेहरा देखा यद्यपि अभी भी अमेरिका, अफगानिस्तान में एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है लेकिन इसमें असफलता के लिए काफी हद तक अमेरिकी नीतियाँ ही जिम्मेदार हैं दो माह पूर्व विक्की लीक्स द्वारा प्रसारित तथ्य इसी ओर इशारा करते हैं सब कुछ जानते हुए अब भी अमेरिकी नीति-नियंता अपनी पुरानी नीतियों को ही अमलीजामा पहनाने में व्यस्त हैं यह सही है कि भारत, अफगानिस्तान में आतंक के खिलाफ चल रहे तथाकथित युद्ध में सीधे रूप से शामिल नहीं है फिर भी अमेरिकी रक्षा नीतियाँ अप्रत्यक्ष रूप से भारत के खिलाफ ही जाती रही हैं अमेरिका, अफगानिस्तान के मोर्चे पर शीत युद्ध के काल से पाकिस्तान को अपना महत्वपूर्ण सहयोगी मानता रहा है लेकिन पाकिस्तान ने अमेरिकी सहायता को सदैव भारत के खिलाफ प्रयोग किया है ओबामा सरकार ने अपनी नई अफ-पाक नीति में साफ़ तौर पर यह घोषणा की है कि अमेरिका पाकिस्तान को अफगानिस्तान के मोर्चे पर सहायता प्रदान करने के एवज में लगभग डेड़ अरब डॉलर की प्रतिवर्ष सहायता देगा भारत इस विषय पर कई बार अपनी चिंताएं अमेरिका से जाहिर कर चुका है कि इस सहायता राशि का प्रयोग भारत में आतंक फैलाने में किया जाता है , इसके विपरीत अमेरिका भारतीय क्षेत्र में फैले हुए आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाने के बजाय भारत पर ही अपनी पश्चिमी सीमाओं और कश्मीर से सेना में कमी करने का दवाब बनाता रहता है विक्की लीक्स के खुलासों के बाद ओबामा का भारत दौरा भारतीय सरकार द्वारा अमेरिका पर अपनी अफ-पाक नीति की पुनः समीक्षा करने का दवाब बनाने का अच्छा मौका हो सकता है परन्तु यह भारत सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति पर ही निर्भर करता है
दूसरी ओर भारत को पिछले काफी समय से यह उम्मीद है कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थाई सदस्यता का समर्थन करे जबकि ओबामा सरकार अपने कार्यकाल के प्रारंभ से ही भारत पर परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने का दवाब बना रही है
यदि इन कूटनीतिक मुद्दों को वर्तमान द्विपक्षीय संबंधों से एक बारगी अलग भी रखा जाए तब भी भारत-अमेरिका के आर्थिक एवं द्विपक्षीय व्यापारिक सम्बन्ध महत्वपूर्ण हैं अमेरिका और पश्चिमी देश अभी भी २००८-०९ की आर्थिक मंदी से पूरी तरह से उबार नहीं पाए हैं हालांकि भारत इससे अछूता नहीं है लेकिन भारत के बड़े घरेलू बाज़ार, सरकार की मौद्रिक नीतियों एवं धन प्रवाह पर मज़बूत पकड़ ने मंदी के प्रभाव को कम अवश्य किया है अमेरिका को मंदी की इस स्थिति से उबरने के लिए भारत का बड़ा बाज़ार दिखाई दे रहा है जहां वह अपनी वस्तुओं एवं सेवाओं को खपा सकता है, इस नज़रिए से भी इस समय भारत, अमेरिका की नज़रों में महत्वपूर्ण बन जाता है लेकिन इस मामले में विश्व व्यापार संगठन(डब्ल्यू.टी.ओ.) में भारत और अमेरिका के बीच के विवाद बने हुए हैं एक ओर अमेरिका चाहता है कि भारत अपना घरेलू बाज़ार कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के लिए खोल दे वहीँ दूसरी ओर आर्थिक मंदी के बाद अमेरिका एवं अन्य पश्चिमी देशों ने अपना बाज़ार लगभग बंद कर दिया इसके साथ ही इन देशों ने अपनी नई वीजा और कर नीतियों से भारतीय कामगारों के लिए राह कठिन कर दी है भारत चाहता है कि अमेरिका पहले अपनी कृषि पर सब्सिडी को कम करे साथ ही वीजा नियमों को भी कुछ नरम करे, लेकिन इस मुद्दे पर अभी दोनों देशों में मतभिन्नता है
सही मायने में देखा जाए तो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका, भारत को अपने एक मज़बूत सहयोगी के रूप में रखना चाहता है क्योंकि अब विश्व एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय होने कि ओर अग्रसर है चीन और रूस पुनः विश्व में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, इसके साथ में बाजील-रूस-भारत-चीन(ब्रिक), भारत-ब्राज़ील-दक्षिण अफ्रीका(इब्सा), रूस-चीन-भारत(रिक) जैसे व्यापारिक संगठन न केवल आर्थिक रूप से बल्कि कूटनीतिक रूप से भी विश्व को बहुध्रुवीय बनाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं ऐसे में अमेरिका को भारत के रूप में शांतिपूर्ण, तीव्र प्रगतिशील एवं लोकतान्त्रिक सहयोगी की अपेक्षा है इसीलिये अमेरिका ने भारत को असैन्य परमाणु समझोते और नवीन हथियार प्रौद्योगिकी बेचने में दिलचस्पी दिखाई है जिससे एक ओर एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित होता है वहीँ दूसरी ओर अमेरिका के भारत से सैन्य सम्बन्ध भी मज़बूत हो रहे हैं
लेकिन केवल मज़बूत संबंधों से ही भारत की अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, ओबामा का दौरा नई-दिल्ली के लिए एक मौका है जिसमे वह वाशिंगटन डी.सी. के सामने पर्यावरणिक मुद्दों, बौद्धिक सम्पदा अधिकार आदि पर अपने पक्ष मज़बूत कर सकती है क्यों की मंदी के बाद अमेरिका काफी हद तक बैकफुट पर है लेकिन इसका अर्थ यह बिलकुल भी नहीं कि सिर्फ अमेरिका को ही भारत की आवश्यकता है भारत को तीव्र विकास बनाए रखने के लिए अमेरिका जैसे बड़े पूंजीवादी देश की आवश्यकता है इसके अतिरिक्त भारत अभी भी चीन की विस्तारवादी नीतियों से आशंकित है जो उसे अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश का महत्वपूर्ण सहयोगी बनने पर मजबूर कर रहा है
सारांश के रूप में, वर्त्तमान समय में भारत और अमेरिका दोनों देशों को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, विश्वव्यापी आर्थिक मंदी, पर्यावरण संरक्षण, विश्व व्यापर संगठन में समन्वय एवं परमाणु निरस्त्रीकरण जैसे मुद्दों से मिलकर निबटने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए परन्तु इन समस्याओं को सुलझाने की युक्तियों पर दोनों देशों में मतभिन्नता भी है, साथ ही साथ विश्व राजनीति का भी द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव पड़ता है बहरहाल बराक ओबामा की आगामी भारत यात्रा पर दोनों देश एक-दूसरे से काफी कुछ उम्मीदें पाले बैठे हैं लेकिन अभी एक लम्बा रास्ता तय करना बाकी है
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