ये बात मैं यहां तो लिख सकता हूं लेकिन किसी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवा से नहीं कह सकता क्योंकि मुझे पता है कि मुझे जवाब में काफी कुछ सुनने को मिल सकता है। फिर भी स्थितियों को देखकर दुख तो होता ही है जबकि देश का एक होनहार कीड़े वाले डिब्बे का खाना खाता है और पेशाबघर के बगल में बने खोखे से चाय खरीद कर पीता है
मुझे अभी भी याद है
कि जब अपने शहर की एक शादी में गया था तो सब कुछ सामान्य था लेकिन यकायक एक पुलिस
वैन और एक बत्ती वाली गाड़ी के आते ही उस शादी में बारात का स्वागत रुक चुका था।
हां, ये सही है कि उस समय बाराती खुद को ठगा सा महसूस कर रहे थे लेकिन 100 रुपये के
लिफाफे में घर के पांच सदस्यों को दावत में लाने वाले मध्यमवर्गीय परिवार के
मुखिया अपने बच्चों को बता रहे थे कि देखो, ये हमारे शहर के कलैक्टर साहब हैं।
देखा बत्ती का क्या रौब होता है।
दरअसल वो लोग अपने
बच्चों की आखों में अपने आकांक्षारूपी सपनों को पालने का प्रयास कर रहे थे। कहानी
गलत नहीं है, ऐसा होता भी है लेकिन ये बात अलग है कि बच्चे ये नहीं जानते कि अखंड
प्रताप सिंह, आईएएस और आईएएस खेमका में क्या अन्तर है। फिर भी, अगर मुद्दे की बात
की जाए तो बच्चों और युवाओं का सपने देखना तो किसी मायने में गलत नहीं है चाहे वो
जो भी सोचकर देखे गए हों। और एक सच ये भी है कि इन सपनों की खातिर अपनी हड्डियां
तक गलानी पड़ जातीं हैं। सपना कुछ और नहीं हैं, सपना है देश की सर्वश्रेष्ठ
प्रशासनिक सेवाओं में जाने का। कुछ ऐसे ही सपने पाले लाखों युवा मुझे घेरे हुए
हैं। कभी मैं भी उनमें से एक था लेकिन अन्तर्मन के विद्रोह और प्रतियोगिता के
प्रति डर (कुछ लोगों के मुताबिक) ने मुझे इस समुदाय से अलग कर दिया। लेकिन क्या
वास्तव में, मैं इस समुदाय या माहौल से अलग हो पाया हूं। ये सवाल आज भी मैं अपने
आप से पूछ ही लेता हूं क्योंकि आज भी मैं वहीं पर रहता हूं बस बेरोजगार नहीं उससे
बस कुछ अधिक या कहें कमतर बनकर।
लिखने और बताने को
तो काफी कुछ है लेकिन ये भी सच है चाहे कचरा हो या हीरा, दोनों को निकालने के लिए
गढ्ढे में उतरना ही पड़ता है। क्या आप लोगों ने कभी ऐसा देखा है कि 20 रुपये के
मूल्य की थाली के 50 रुपये देकर एक चश्मा लगाए लड़के का पेट नहीं भरता और वो पानी
पीकर पेट भर लेता है। आपके सामने ऐसा हो तो कहोगे कि हम ही उसे खाना खिला देते
लेकिन ये भी सच है कि उस लड़के के चेहरे के खुद्दारी और ईमानदारी के भाव जरूर आप
को डरा देंगे। मैंने ऐसा होते हुए देखा है, कभी-कभी सोचता हूं कि अगर एनडीटीवी
वालों ने रवीश की रिपोर्ट को बंद न किया होता तो रवीश किसी न किसी दिन इस फैक्ट्री
में भी आ ही जाते। जी हां, इस फैक्ट्री से आईएएस निकलते हैं और देश या कहें दिल्ली
में इसका एक ही पता है...मुखर्जी नगर और आस-पास का इलाका। कभी आकर भी देखिए, बत्रा सिनेमा हॉल के चारों तरफ भीड़ का नजारा ही अलग होता
है। आंखे ऊपर उठाएंगे तो कोचिंग सेंटर के विज्ञापन करते रंग बिरंगे बोर्ड देखकर
सिर चकरा जाएगा। जब थोड़ा सा शान्त होंगे तो चारों तरफ अमीर-गरीब, चश्मे वाले-बिना
चश्मे वाले और चाय पीते या किताब खरीदते लड़के-लड़कियों को देखकर आपको अच्छा लगने
लगता है। लेकिन अगर इनकी लाइफस्टाइल आपने ले ली तो ये निश्चित है कि या तो आप घर
के पलंग पर लेटे मिलेंगे या अस्पताल के। देखने, कहने और सुनने में काफी अच्छा लगता
है कि बेटा या बेटी आईएएस के लिए तैयारी कर रहे हैं लेकिन जब पास आकर देखेंगे तो
पता चलेगा कि किस प्रकार यहां एक दूसरे तरीके का लूट तंत्र विकसित किया गया है।
चाहे कोचिंग वाले हों या मकान मालिक, दुकानदार हों या फेरी वाले सभी इस आंधी में
आम बटोर लेना चाहते हैं।
मुझे अभी भी याद है
जब साल 2007 में, मैं इंजीनियरिंग और पत्रकारिता का बेहतर कैरियर छोड़कर आईएएस
करने आया था। मुझे एक बेहतरीन कमरा तीन हजार रुपये में मिला था। तब मुखर्जी नगर के
आस-पास के इलाकों में 1500 रुपये में कमरा मिल जाया करता था। लेकिन मुखर्जी नगर और
बत्रा सिनेमा से दूर कौन जाए, यही सोच कर उस समय भी मेरी इमारत में हर मंजिल पर
बनी रसोइयों (किचेन) में 1500 रुपयों में लड़के रहा करते थे। मुझे आज भी याद है कि
जब एक दिन हिसाब लगाया तो पाया कि हमारे बाप की क्लास वन नौकरी से कहीं ज्यादा तो
ये जाहिल कमा रहे हैं जो कि इतनी तमीज भी नहीं रखते थे कि जो उनके घर का राशन चला
रहा है उससे तमीज से पेश आएं। आज के हालात कुछ अलग हैं। जो कमरा मैंने 2007 में
3000 रुपये का लिया था वो आज 9000 हजार रुपये का मिलता है। रही बात रसोई की तो भी
आप को 3500 या 4000 रुपये में मिल ही जाएगी। किराये के साथ मुखर्जी नगर के मकान
मालिकों के पहनने, खाने-पीने के स्तर में भी सुधार आया है। आज साल 2007 के मुकाबले
मुखर्जी नगर और आसपास के इलाके में दस गुना ज्यादा लम्बी गाड़ियां मकान मालिकों के
पास देखने को मिल जाएंगी। ये सही है कि आज की तारीख में भी मुखर्जी नगर के लोग
किराये पर जी रहे हैं। बहुत कम लोग ही ऐसे हैं जो या तो नौकरी कर रहे हैं या उनका
अपना बिजनेस हो। रात ढलते ही बत्रा सिनेमा के सामने वाले दारू के ठेके गुलजार हो
जाते हैं और पूरे दिन सोकर उठे, घर बैठे बने रईसजादे काले शीशों वाली गाड़ियों में
दारू पीने और मुर्गा खाने के मिशन पर निकल पड़ते हैं। बड़ा ही आनन्ददायक माहौल
होता है जब इनके शीशों को फोड़ते हुए हनी सिंह के अश्लील गाने सुनाई पड़ते हैं।
ये तो तस्वीर का एक
पहलू है जनाब। हमारे मुखर्जी नगर में दो मिस्टर सिंह भी है। पहले जो हैं वो लोक
प्रशासन पढ़ाते हैं और कहते हैं कि जहां किताबें खत्म होती हैं वहां से मैं पढ़ना
शुरू करता हूं। ऐसा लगता है जैसे साक्षात् राजकुमार की किसी फिल्म के डायलॉग चल
रहे हों। दूसरे मिस्टर सिंह का दावा है कि इतिहास में जितने सलेक्शन इनके यहां से
हुए हैं उतने किसी के यहां से नहीं होते। दावे दोनों ही बहुत बड़े-बड़े करते हैं
लेकिन यकीन मानिये कि इनके यहां हमारे साथ पढ़े बेहद होशियार मित्रों में किसी का
भी सलेक्शन नहीं हुआ। यहां पर भी मान लें तो ठीक, मैं तो कहता हूं कि इनके यहां
पढ़े बेचारे विषय के आधारभूत ज्ञान से भी वंचित हो गए। दरअलस, भीड़ देखकर यहां भी
हर एक असफल व्यक्ति कोचिंग खोल कर बैठ गया है। लेकिन सोचने वाली बात है कि जब ये
कोचिंग वाले महान ज्ञानी कभी आईएएस की प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर पाये तो
ये कैसे किसी को बल्कि अखबार में छपे चेहरों को आईएएस बना देने का दम भरते हैं। कह
सकते हैं कि ज्ञान और ज्ञानी पर मेरी नकारात्मक सोच है लेकिन व्यग्तिगत तौर पर
मेरा मानना है कि आंधी के आम हैं जो बटोरे जा रहे हैं। हाहाहाहाहा.........
यहां अय्याशी करने
वाले तथाकथित आईएएस की तैयारी करने वाले लड़कों की भी कमी नहीं है लेकिन उनका क्या
जो बेचारे अपना सब-कुछ दांव पर लगाए तैयारी कर रहे हैं। यहां हरियाणा, राजस्थान,
बिहार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमीर और नेतागीरी वाले घरानों के भी लड़के आते हैं
जो गरीब लड़कों को अपने पैसे की घटिया और झूठी चकाचौंध दिखाते रहते हैं। लेकिन
वास्तविकता ये है कि इन रईसजादों के भाग्य में बेहतर भोजन ही होता है जबकि पद और
प्रतिष्ठा तो कीड़े वाले खाने के डिब्बे को खाने वाले लड़के की किस्मत में ही होती
है।
फिर भी, मैं अभी भी
कहता हूं कि सपने देखना बुरा नहीं होता है बल्कि बुरा तो उसे समाज बनाता है। यहां
प्रॉपर्टी डीलरों का मकड़जाल फैला हुआ है। कौन हैं ये लोग? सोचा जा सकता है लेकिन सही मायने में ये लोग यहीं के रहने वाले हैं और एक
दूसरे के मकानों को किराये पर चढ़ाने का कमीशन वसूल करते हैं। यही नहीं, चूंकि ये
महीने के किराये पर कमीशन लेते हैं इसीलिये हर दो से छह महीने में कमरों का किराया
भी बढ़ जाता है। अगर आपको कमरा लेना है तो शाम को अपनी दुकान पर या दारू के ठेके
के आसपास ये आपको झूमते और एक-दूसरे को गरियाते मिल ही जाएंगे।
मैं आपको ये नहीं
जताना चाहता कि मैं किसी छात्र यूनियन का झंडाबरदार हूं। वास्तविकता का एक और पहलू
भी है। ऐसी मजबूर कर देने वाली परिस्थितियों में भी सफल होने वाले छात्रों के बीच
एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे देखकर केवल निराशा ही हाथ लगती है। वास्तव में
लोगों के पास आईएएस बनने का लक्ष्य तो है लेकिन कोई उद्देश्य नहीं है। इससे भी
ज्यादा निराशा आपको तब होगी जबकि किसी बड़े अधिकारी का बेटा या भाई न केवल बताता
है बल्कि इस बात पर गर्व करता है कि वो जिस पैसे से अय्याशी कर रहा है वो
भ्रष्टाचार से कमाया हुआ है।
लेकिन इन सारी बातों
को छोड़कर भी नीतिगत मुद्दों पर बात की जा सकती है। यहां पढ़ने वाले 99.99% युवा जानते हैं कि सरकारी नीतियां गलत हैं लेकिन उनको वही पढ़ना होता है जिसे
पढ़ कर वे सरकारी सेवा की परीक्षा पास कर सकें। दरअसल ये तैयारी करने वाले युवाओं
की नहीं बल्कि सरकार की नीति है कि गलत को भी सही कहो और जैसा चल रहा है वैसा चलने
दो क्योंकि उन्हें सरकारी सेवाओं में जाना है। इस सब स्थितियों को देखकर ये एहसास
होता है कि हम गलत तरीके से केवल गलत लोगों को ही तैयार कर रहे हैं।
ये बात मैं यहां तो
लिख सकता हूं लेकिन किसी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवा से नहीं कह सकता
क्योंकि मुझे पता है कि मुझे जवाब में काफी कुछ सुनने को मिल सकता है। फिर भी
स्थितियों को देखकर दुख तो होता ही है जबकि देश का एक होनहार कीड़े वाले डिब्बे का
खाना खाता है और पेशाबघर के बगल में बने खोखे से चाय खरीद कर पीता है।
एक बेहतर भविष्य की
उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष
आमंत्रित हैं।
