आज मैं पहली बार एक वास्तविक क्राइम स्टोरी को कवर करने के लिए अपने सीनिअर रिपोर्टर के साथ गया। यह शहर में घटित एक सांप्रदायिक तनाव था। दरअसल नगर के एक मिश्रित आबादी वाले इलाके में एक दिन पूर्व ही कुछ नवयुवकों में मारपीट हो गयी थी। अगले दिन सुबह एक समुदाय के कुछ राजनीतिक नेतागण पधारे और उन्होंने दूसरे समुदाय के लोगों के खिलाफ लोगों को भड़काया और बाज़ार बंद करके जाम लगवा दिया। जब पुलिस आई तो पहले समुदाय ने दूसरे समुदाय के लोगों के खिलाफ नामज़द तहरीर दी।
इधर जब दूसरे समुदाय के पास यह खबर पहुँची तो वे भी भड़क गए और उन्होंने भी एक मार्ग पर पर जाम लगा दिया। तब पुलिस ने हरकत में आते हुए तुरंत अतिरिक्त पुलिस बल को इलाके में तैनात किया।
शाम के समय तक इलाके का बाज़ार बंद रहा लेकिन तनावपूर्ण शांति बनी रही। रात के आठ बजे पुनः कुछ युवकों के बीच मार-पीट की खबर आई तब मैं और मेरे सीनियर रिपोर्टर मौके पर पहुंचे। वहां काफी संख्या में आक्रोशित लोगों भीड़ थी जो कि घटना का विरोध करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग कर रही थी।
चूँकि मैं पहली बार ऐसे माहौल में गया था इसलिए मेरे सीनियर ने मुझे कुछ आवश्यक नसीहत देते हुए अपने साथ आगे लिया। वहां पर पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि कैसे कोई साधारण घटना राजनीति के द्वारा सांप्रदायिक रूप ले लेती है।
मैंने देखा कि यदि उस इलाके में पुलिस बल मौजूद न हो तो मामला काफी गंभीर बन सकता है। प्रश्न यह नहीं है कि गलती किसकी है क्योंकि गली मोहल्लों में ऐसी घटनाएं अक्सर होती हैं, लेकिन एक ऐसे इलाके में जो कि अपेक्षाकृत हमेशा शांत रहता है वहां केवल नेतागीरी की वजह से एक अच्छा खासा सांप्रदायिक तनाव बन गया है।
मैंने जिस तरह से इलाके में मामले की पड़ताल की, उस पर मेरे सीनियर रिपोर्टर ने मेरे साहस कि प्रशंसा की। मेरे लिए यह एक चौकाने वाला अनुभव था लेकिन शायद आज ही सही मायने में मेने महसूस किया कि एक क्राइम रिपोर्टर कि जिंदगी क्या होती है।
अंत में , मैं अपने सीनियर रिपोर्टर और अपने एडिटर साहब को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने मुझे ऐसे नाज़ुक मौके पर घटनास्थल पर जाने कि इजाज़त दी।
गुरुवार, 17 जून 2010
बुधवार, 16 जून 2010
शर्मनाक
भोपाल गैस त्रासदी का जिन्न पुनः बोतल से बाहर आ गया है।हमेशा की तरह फिर से भारतीय राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर जारी हो गया है। देश के दोनों प्रमुख दल एक-दूसरे को जनता का अधिक हितैषी जताने के लिए प्रयासरत हैं। और बेचारे पीड़ित अभी भी अपनी आँखों से मिथाइल -आइसो साइनेट के खूनी आंसू रो रहे हैं।
वो तो भला हो आज की हाई स्पीड मीडिया का जो इतने सालों बाद पुनः मामले की छानबीन करने पर उतारू है। परत दर परत ये भेद खुलते जा रहे हैं कि राजनीति ने उसी जनता की किस प्रकार अवहेलना की है जो कि लोकतंत्र में राजनीति का आधार है।आखिर जिस जनता ने वोट दिया उसके प्रति जवाबदेही किसकी बनती है?
क्या अब पुनः सरकार के द्वारा मुआवजा देकर भोपाल की जनता को पूर्ण न्याय मिल पायेगा? क्या यही है हमारा लोकतंत्र जो स्वयं को समता और न्याय पर आधारित बताता है?
आपकी टिप्पणियां सहर्ष आमंत्रित हैं।
वो तो भला हो आज की हाई स्पीड मीडिया का जो इतने सालों बाद पुनः मामले की छानबीन करने पर उतारू है। परत दर परत ये भेद खुलते जा रहे हैं कि राजनीति ने उसी जनता की किस प्रकार अवहेलना की है जो कि लोकतंत्र में राजनीति का आधार है।आखिर जिस जनता ने वोट दिया उसके प्रति जवाबदेही किसकी बनती है?
क्या अब पुनः सरकार के द्वारा मुआवजा देकर भोपाल की जनता को पूर्ण न्याय मिल पायेगा? क्या यही है हमारा लोकतंत्र जो स्वयं को समता और न्याय पर आधारित बताता है?
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मंगलवार, 15 जून 2010
राज ठाकरे के जन्मदिन पर अनोखा तोहफा
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने राज ठाकरे को उनके जन्म दिन पर एक खुश करने वाला तोहफा दिया है। मनसे कार्यकर्ताओं ने पुणे में बिहारी मजदूरों पर हमले किये हैं साथ ही कंपनी मालिकों को भी धमकी दी गयी है कि वे उत्तर प्रदेश और बिहार से आये मजदूरों को नौकरी से निकाल दें। यह घटना १४ जून की है।
महाराष्ट्र में ऐसी घटनाएँ पिछले काफी समय से घटित हो रही हैं। ये घटनाएँ भारत की विभाजनकारी राजनीति का ही दर्पण हैं।
महाराष्ट्र में ऐसी घटनाएँ पिछले काफी समय से घटित हो रही हैं। ये घटनाएँ भारत की विभाजनकारी राजनीति का ही दर्पण हैं।
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