शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

शर्मिन्दा हूं मैं!


शर्मिन्दा हूं मैं!
हां, माफ कर दो मुझे, शर्मिन्दा हूं मैं
शर्मिन्दा हूं उसके लिए नहीं, जो ज़ुल्म उन जालिमों ने तुम पर ढहाए थे
बल्कि शर्मिन्दा हूं अपनी उस नामर्दी पर जो तुम्हें बचा न सकी।
याद है मुझे वाक़या उस दिन का
जब तुम काम से थकी घर जा रही थी
मासूम थीं तुम पूरे कपड़ों से ढकी,
लेकिन तब भी दरिन्दों की नजरों से तुम न थीं बची
शर्मिन्दा हूं मैं अपनी उस, उस आवाज़ के लिए
जो तुम्हें न बचा सकी उन वहशी नज़रों से!
याद है मुझे वो दिन
जब राखी खरीदने तुम बाजार में थी,
लेकिन तुम अकेली न थीं उस समाज में,
वहशियों की पूरी भीड़ थी उस बाजार में,
हां, घूर रहे थे तब भी वो तुम्हें
लड़की नहीं एक मांस का टुकड़ा समझे थे,
जिन्दा नहीं हाड़ मांस का एक पुतला समझे थे!
हां, माफ कर दो, शर्मिन्दा हूं मैं
ये सच है, शर्म से गढ़ गया था मैं,
अपने दोस्तों के बीच ही अकेला पड़ गया था मैं।
उनके मन की वहशियत भी समझ गया था मैं,
कलेजा मेरे मुंह में था,
फिर भी जिन्दा होकर मुर्दा ही बना रहा मैं।

हां, ये सच है कि कल रात दो आंसू मैंने भी बहाए थे
जो जख्म तुमने खाए, दिल पर मैंने भी वो पाए थे,
तुम्हारे दर्द से अब ये जान पाया हूं मैं,
शायद अब अपनी खोयी मर्दानगी ढूंढ पाया हूं मैं।
वादा है मेरा तुमसे कि अब रहोगी तुम आजाद,
दरिन्दों को अब बता दूंगा मैं उनकी औकात
शायद फिर भी न दर्द होगा तुम्हारा कम,
शर्मिन्दा हूं मैं मुझे माफ कर देना तुम।
 -नीरज(19/12/2012)
माफ करें लेकिन इस बार आपके विचारों की कोई ज़रूरत नहीं है.....
केवल एक बेहतर भविष्य की उम्मीद है! 

सोमवार, 13 अगस्त 2012

आखिर जनता के लिए विकल्प ही क्या हैं?


टीम अन्ना ने जहां राजनीतिक विकल्प देने की बात कही, वहीं दूसरी ओर योगगुरू रामदेव भी फिर से अपने लाव-लश्कर के साथ दिल्ली में उतर गए हैं। लेकिन कहीं से भी ऐसा एक राजनीतिक संदेश नहीं मिल पा रहा है जिसे आगामी आम चुनाव में जनता विकल्प के रूप में आजमा कर देख सके।

रामलीला मैदान से लेकर संसद तक या फिर सड़क से लेकर घर तक हर आदमी के कुछ सवाल हैं। सवाल हैं लेकिन अभी तक इनके जवाब नहीं आए हैं, तो इन सवालों से एक और सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर इन आंदोलनों का औचित्य ही कहां है।
दरअसल वर्तमान राजनीतिक और आंदोलनों के माहौल में कहीं न कहीं जनता खुद को ठगा सा महसूस कर रही है। टीम अन्ना ने जहां राजनीतिक विकल्प देने की बात कही, वहीं दूसरी ओर योगगुरू रामदेव भी फिर से अपने लाव-लश्कर के साथ दिल्ली में उतर गए हैं। लेकिन कहीं से भी ऐसा एक राजनीतिक संदेश नहीं मिल पा रहा है कि जनता को लगे कि जिस महंगाई और भ्रष्टाचार ने उसकी कमर तोड़ रखी है उसका कोई उपाय निकल सकता है।
सवाल ये भी उठता है कि कहीं आंदोलनों की आड़ में जनता से खिलवाड़ तो नहीं किया जा रहा। शुरुआत से शुरू करते हैं। तहरीर चौक से दुनियाभर में शुरू हुए आंदोलनों के दौर ने आम समाज को एकसाथ उठ खड़े होने का संदेश तो दिया है लेकिन उससे वो परिणाम अभी तक सामने नहीं आए हैं जिनकी उम्मीद हर आंदोलन के शुरू होते समय की जाती है। भारत के माहौल में भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ है। टीम अन्ना ने जब पिछले साल अपना आंदोलन शुरू किया था तब अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठे थे। उनकी मांग थी कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जब तक जन लोकपाल कानून नहीं बन जाता तब तक अनशन जारी रहेगा। लेकिन शायद सरकार ज्यादा मजबूत हो गई और उसने न केवल अनशन तुड़वाया बल्कि ऐसा कोई हवाई कानून भी लागू नहीं किया जिसके लिए अनशन किया गया था। जनता में उस समय एक विश्वास जागा था कि इसी व्यवस्था में एक कानून बन सकता है जो समाज से भ्रष्टाचार को मिटाकर विकास की एक नई इबारत लिखे। लेकिन जनता के अरमानों पर तभी पानी फिर गया जब टीम अन्ना ने राजनीति का रुख लेना शुरू कर दिया। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि आप सत्ताधारी दल का विरोध करते हैं तो कहीं न कहीं विपक्ष का समर्थन भी करते हैं।
लेकिन बात यहीं आकर खत्म नहीं होती। जिस टीम अन्ना को दिल्ली के रामलीला मैदान में एनडीए से लेकर वाम दलों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तक का समर्थन मिला था वो अपार जनता को देखकर बौखला गई और संसद पर ही कीचड़ उछालने लगी। इसे टीम अन्ना का गैर लोकतांत्रिक रुख भी माना गया। नतीजा ये हुआ कि उसने फिर से खुद को पाक-साफ बताने की कोशिश शुरू की। इस कोशिश में राजनीतिक दलों ने तो फिर से संसद का रास्ता पकड़ा ही, संघ ने भी अपने हाथ खींच लिए। टीम अन्ना के राजनीतिक कैंपेन का असर मुंबई में देखने को मिला। हाल में, टीम अन्ना ने फिर से झुकते हुए खुद को पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग लिया है जिससे जनता को यही संदेश गया है कि उम्मीद से भरे एक आंदोलन का अंत हो चुका है।
वहीं दूसरी ओर, पिछले साल रामदेव भी रामलीला मैदान में पहुंचे थे। मुद्दा था विदेशों में जमा काले धन को वापस लाया जाए। रामदेव ने जनता से कहा कि अगर ये धन वापस आ जाए तो भारत फिर से सोने की चिड़िया बन जाएगा। आमजन ने रामदेव के हाथ मजबूत किए लेकिन अंत में सरकार ने फिर से शिंकजा कसते हुए रामदेव को भागने पर मजबूर कर दिया। दूसरी बार अब फिर से रामदेव रामलीला मैदान पहुंचे और इस बार तेवरों और मुद्दों में बहुत बड़ा अंतर देखने को साफ मिल रहा है। अब रामदेव का कहना है कि सीबीआई सरकार के हाथ की कठपुतली है और इसे स्वायत्त किया जाए। हालांकि मुद्दा बहुत पुराना है और समय-समय पर उठाया जाता रहा है लेकिन संशय की स्थिति तब उत्पन्न होती है जबकि रामदेव की कंपनी को चलाने वाले और उसके सीईओ बालकृष्ण पर सीबीआई की जांच चल रही हो और टीम अन्ना का रामदेव के आंदोलन पर ठंडा रुख दिखाया गया हो।
दरअसल इस मुद्दे के भी दो पहलू हैं। पहला ये कि संघ द्वारा टीम अन्ना के आंदोलन से हाथ खींच लेने के बाद उसका असर आंदोलन पर साफ देखा गया और इसीलिए अन्ना के साथ मंच पर आई बीजेपी ने भी इससे दूर रहना ही बेहतर समझा। इस प्रकार टीम अन्ना ने अपनी जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए राजनीति के रास्ते को स्वीकार कर लिया। दूसरा पहलू ये है कि शुरू से ही रामदेव के आंदोलन का समर्थन करने वाले संघ ने फिर से रामदेव के हाथ मजबूत किए हैं और 2014 के आम चुनावों को देखते हुए एनडीए ने भी सरकार की टांग खींचने के लिए रामदेव के आंचल से लटकने में ही भलाई समझी है। लेकिन इससे एक बार फिर से जनता विकल्पहीनता की स्थिति में नजर आती है क्योंकि अगर यूपीए से त्रस्त जनता एनडीए के सिवाय कोई दूसरा रास्ता देखे तो अंधेरा ही नजर आता है। वर्तमान में अगर टीम अन्ना चुनावों में उतर भी जाती है तो तीसरे मोर्चे के कम ही आसार हैं। वहीं दूसरी तरफ एनडीए में भी प्रधानमंत्री के पद को लेकर चल रहा शह और मात का खेल जनता को निराश करता है।
दरअसल इन सारी बातों से अंत में एक ही सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर जनता के पास विकल्प ही क्या हैं। वर्तमान राजनीतिक गठजोड़ों से निराश जनता जब संसद की ओर चलाना शुरू करेगी तो दो रास्ते होंगे। पहला टीम अन्ना की तरफ जाता होगा और दूसरा रामदेव की तरफ। लेकिन जिन्हें खारिज करके जनता इन रास्तों पर चलेगी वो संसद से पहले एक ही सड़क पर जाकर मिल जाते हैं। एक ओर जनता कानून बनाने वाली संसद से निराश है और महंगाई, भ्रष्टाचार से त्रस्त है, दूसरी ओर आंदोलनों के रास्ते पर जाते हुए भी उसे आंदोलनों के नेताओं में वही सत्ता लोलुपता साफ दिखाई दे रही है। तो प्रश्न आखिरकार वहीं आकर खड़ा होता है कि क्या इन आंदोलनों का औचित्य पूरा होता है या इनके होने पर आखिर जनता को कौन सा नया विकल्प मिला है।

एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
 
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं।

सोमवार, 6 अगस्त 2012

भारत की बेटियां नहीं हैं फिजा और गीतिका...

कल अगर ओलंपिक में मैरीकॉम कोई पदक जीत लाए तो वो मणिपुर में रहने वाली एक भारतीय महिला होगी और कई सालों से भूखी मरने वाली इरोम शर्मिला इनके लिए एक देशद्रोही और कानून तोड़ने वाली महिला हो जाती है। 


आज फिजा के मौत की खबर आई और कल ही गीतिका ने मौत को गले लगाया था। कहां है वो भगवाधारी और कहां हैं वो टोपी वाले जो हमारे समाज में लड़कियों और औरतों को समाज में व्यवहार की नसीहत देते हैं। इनमें से कुछ गुण्डे तो ऐसे भी हैं जो सरेआम अपनी मां और बहनों जैसी लड़कियों को न सिर्फ मारते पीटते हैं बल्कि उन्हें नंगा तक कर देते हैं। बहुत पुरानी बात नहीं हुई जब असम में सरेआम एक लड़की को नंगा किया था इन बेशर्मों ने। ये कहते हैं कि हम धर्म और संस्कृति के रक्षक हैं।
क्या हुआ उनका जो सरेआम एक लड़की को नंगा करते हैं? क्या होगा उनका जिनसे एक लड़की प्यार करते हुए न सिर्फ अपना मज़हब छोड़ देती है बल्कि अपने मां-बाप का दिया हुआ नाम तक छोड़ देती है? क्या एक अंधे समाज के विधायक को सजा मिलेगी क्योंकि उसने एक लड़की का इस कदर शोषण किया कि उसने मौत को गले लगाना बेहतर समझा?
शर्मनाक....
कल अगर ओलंपिक में मैरीकॉम कोई पदक जीत लाए तो वो मणिपुर में रहने वाली एक भारतीय महिला होगी और कई सालों से भूखी मरने वाली इरोम शर्मिला इनके लिए एक देशद्रोही और कानून तोड़ने वाली महिला हो जाती है।
कल जब बात होगी तो यही ठेकेदार कहेंगे अरे साहब! छिनाल थी, जीते जी भी अपने परिवार का नाम खराब किया और मर के भी। किसी को क्या दुख होगा ऐसी औरत के मरने का। मैं कहता हूं कि क्या उस औरत का प्रेमी जो पुरूषोत्तम बना बैठा है और जो अपनी बीवी और बच्चों को छोड़ने के बाद भी दोषी नहीं है, उसको सजा नहीं मिलनी चाहिए। अगर छिनाल औरतों को मौत की सजा देना या मरने के लिए मजबूर करना ही इस समाज का दस्तूर है तो उस घटिया आदमी को भी सरेआम मौत के घाट उतार देना चाहिए जो ऐसी किसी महिला को सरेआम नंगा करे या मरने पर मजबूर करे।
दरअसल हमारे समाज की बुनियाद ही ऐसी बनाई गई है जहां महिलाओं के लिए त्रिया चरित्र जैसा घटिया और शर्मनाक शब्द प्रयोग किया गया है। आखिर कब तक अपनी जान की कीमत पर इस समाज में सीताओं को अग्नि परीक्षा देनी होगी? उस समाज में जहां हर पुरूष पुरुषोत्तम बना बैठा हो और औरत पीड़ा की आग में जलती रहे...
अगर ऐसे भारत के सपूतों को गर्व है अपने भारत पर तो गीतिका और फिजा जैसी तमाम बेटियां जो सिर्फ झूठे सम्मान की बलि चढ़ती हैं, भारत की बेटियां नहीं हैं।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं। 

रविवार, 3 जून 2012

जनसेवकों के सम्मान में समर्पित



 " हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"


ये हमारे भारतीय संविधान की प्रस्तावना है। खाली समय में मेरे द्वारा लिखी गई किसी भी बकवास को पढ़ने से पहले इसे ध्यान से पूरा जरूर पढ़ें। आप पूछेंगे क्यों? तो उत्तर ये है कि इस प्रस्तावना में भारतीय संविधान का पूरा सार है। इसमें बताया गया है कि आखिर हमारी व्यवस्था कैसे चलेगी। वैसे, देखा जाए तो व्यवस्था तो ऊपर दी गई तारीख 26 नवम्बर, 1949 से ही चल रही है लेकिन जांच पड़ताल में क्या जाता है। दरअसल, ये फालतू बातें दिमाग में तब आईं जब समाचार में पढ़ने को मिला कि भारत सरकार की वित्तीय अवस्था ठीक नहीं है और सरकारी खर्चों को कम करने की कवायद शुरू की जा चुकी है। सवाल एक और था कि सरकार के मुताबिक पिछले कई सालों में देश ने अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति की है, लोगों की आमदनी में बढ़ोत्तरी हुई है, गरीबी कम हुई है तो आखिर सरकार की हालत कैसे पतली हो गई। खैर, इतनी लम्बी आर्थिक बहस में जाने का मेरा कोई इरादा नहीं है क्योंकि मनमोहन सिंह इस देश के प्रधानमंत्री हैं बल्कि मेरी ये बकवास तो जनसेवकों को समर्पित है न कि मेरे जैसे ठलुओं के लिए जो इसे लिखते हैं और फिर उसे दूसरों को पढ़ने के लिए पेश भी करते हैं।
हमारे इस संविधान में ये निर्धारित किया गया कि कौन क्या काम करेगा। जनता को सर्वोपरि रखा गया और उससे कहा गया कि अपनी सेवा के लिए आप सेवक चुनें वो लोकसेवक या जनसेवक होंगे। ये जनसेवक आपके विकास औऱ हितों के लिए काम करेंगे। जनता ने कहा ठीक है, इस व्यवस्था को चलाने के लिए हम टैक्स (कर) देंगे और जनसेवक हमारे विकास के लिए कानून बनाएंगे। इन सभी माननीय जनसेवकों के लिए संसद बनाई गई और वहीं से जनता का भाग्य निर्धारित होना शुरू हो गया। समय बीतता गया और जनसेवक अपनी सेवा में लगे रहे जिससे हमारे देश ने अभूतपूर्व प्रगति की लेकिन जनसेवकों को क्या मिला। चलिए, अब ये जान लेते हैं कि जनता के लिए धन की कमी का रोना रोने वाली सरकार और कानून बनाने वाले बेचारे जनसेवकों को आखिर मिल क्या रहा है।
- बेचारे जनसेवकों (सांसदों) की महीने की पगार केवल 12 हजार रुपये है।, इसके अलावा
- जनसेवकों को कार्यालय के खर्चे के लिए 14 हजार रुपये हर महीने मिलते हैं,
- निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 10 हजार रुपये प्रतिमाह,
- रोजाना की यात्रा का खर्चा,
- रेलवे की प्रथम श्रेणी में साल भर के दौरान अनियमित यात्राएं मुफ्त,
- बिजनेस क्लास में साल भर के दौरान 40 हवाई यात्राएं मुफ्त,
- दो हजार रुपये प्रतिमाह के किराए पर दिल्ली के सबसे महंगे इलाके में आलीशान बंगला,
- हर साल 50 हजार यूनिट मुफ्त बिजली,
- साल भर मुफ्त पानी,
- टी.वी., फ्रिज, सोफा आदि से सुसज्जित बंगले का मुफ्त रखरखाव,
- तीन टेलीफोन नंबर और उन पर साल भर की एक लाख 70 हजार कॉल मुफ्त,
- मुफ्त चिकित्सा सुविधा आदि।
कुल मिलाकर, एक जनसेवक का सालाना खर्च 32 लाख रुपये (2.66 लाख रुपये प्रतिमाह) और इसमें नौकरों और सुरक्षा का खर्च नहीं जोड़ा गया है। इस हिसाब से हमारे 543 जनसेवकों का कुल सालाना खर्च जान लें तो और भी बेहतर होगा। ये है लगभग 868 करोड़ रुपये। बताइये भला, इतने तीव्र प्रगतिशील देश में जनसेवकों की मुफलिसी का ये आलम है। वैसे इस खर्च में देश के सभी सरकारी अधिकारियों (आईएएस से लेकर राज्य कर्मचारियों तक) के खर्च भी जोड़ दिए जाएं तो आपको पता चलेगा कि जनता के विकास में अभूतपूर्व भागीदारी के लिए कितना कम सरकारी खर्च किया जा रहा है। आइये, अब जरा इनकी सेवाओं से जनता का कितना विकास हुआ इसको भी सरसरी नजरों से देख लेते हैं।
सरकार के मुताबिक अगर आप 30 रुपये रोज कमाते हैं तो आप गरीब नहीं हैं। तब भी आधी से ज्यादा जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है, हालांकि सरकार इसे काफी कम बताने का प्रयास करती रहती है। जरा सोचिए जब भारत में इतनी बड़ी जनसंख्या साइकिल पर चलने की भी हैसियत नहीं रखती तो कम से कम जनसेवकों को बिजनेस क्लास में जनता के पैसे पर मुफ्त हवाई यात्रा तो मिलनी ही चाहिए। उस पर भी हमारे देश में भ्रष्टाचार जैसी कोई समस्या नहीं है। जनता के सारे संसाधन उसी की सेवा में समर्पित हैं। इस प्रकार एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य अर्थात भारत की व्यवस्था चलती है।
   
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
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शुक्रवार, 25 मई 2012

क्या फर्क पड़ता है

क्या फर्क पड़ता है


मैंने अशोक को दस रुपये दिए तो उसने मुझसे पूछा कि भाई क्या आप पत्रकार हैं? मैंने कहा.. नहीं.....मैं बेकार हूं।

यह बड़ा ही निराशाजनक और नकारात्मक शीर्षक है लेकिन लगता तो ऐसा ही है। दरअसल हम अपने आम जीवन में झांक कर देखें तो पता चलेगा कि एकदम सटीक शीर्षक है कि क्या फर्क पड़ता है।
" उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से समाजवादी पार्टी की सरकार बनीं क्या फर्क पड़ा, पेट्रोल के दाम 7 रुपये से ज्यादा बढ़ाए गए क्या फर्क पड़ा.......... हमारी कोई नहीं सुनता, हमें तो रोज काम करना और पैसा कमाना है।"

अपने शहर आगरा में बाहर निकला सोचा एक दोस्त से मिलकर आता  हूं। चौराहे पर पहुंचा और एक ऑटो वाले से पूछा सिकंदरा चौराहे तक जाने का क्या लोगे? तो बोला 10 रुपये। मैंने कहा कि भाई 5 रुपये ही दिये थे थोड़े दिन पहले अब 10 क्यों ले रहे हो। वैसे आगरा शहर में ऑटो वाले बड़े बदनाम हैं। कहा जाता है कि गुंडागर्दी करते हैं, मनमाना पैसा वसूलते हैं, शहर के ट्रैफिक के लिए समस्या खड़ी करते हैं औऱ न जाने क्या क्या। हालांकि काफी हद तक ये सारी बातें सही भी हैं और इसके बारे में रोज शहर के अखबारों के लोकल पेज में कोई न कोई समाचार जरूर निकलता है। मैंने ऑटो वाले से कहा कि एक तो वैसे ही तुम लोगों की इमेज अच्छी नहीं है ऊपर से रही सही कसर तुम लोग ज्यादा किराया वसूल कर के निकाल देते हो। उसका ऑटो भर चुका था फिर उसने अपने ही बराबर में आगे लटकने के लिए जगह दी और मैं भी उसी ऑटो में सवार हो गया। तब रास्ते में उस ऑटो वाले ने एक पूरी कहानी सुना दी...।
 ऑटो वाले ने अपना नाम अशोक बताया और वह अनुसूचित जाति से संबंधित था। अशोक ने बताया कि एक साल पहले तक वह जूता फैक्ट्री में काम करता था लेकिन वहां कम पैसा मिलने के कारण उसने नौकरी छोड़ दी। फिर किराए पर ऑटो चलाना शुरू कर दिया। अशोक के मुताबिक, ऑटो के मालिक को एक दिन का 350 रुपये किराया देना पड़ता है। फिर दिन के दो घंटे तो सीएनजी के लिए लाइन में खड़े खड़े ही गुजर जाते हैं। खंदारी चौराहे पर बोला कि ट्रैफिक पुलिस वालों को देख रहे हो, ये लोग या तो 300 रुपये का चालान काटते हैं या फिर 100-150 रुपये में छोड़ देते हैं। इनको भी देने ही पड़ते हैं फिर 50 से 100 रुपये तक ठेकेदार ले जाता है। कुल मिलाकर अशोक ने बताया कि लगभग 300 रुपये वो रोज़ बचा पाता है। मैंने कहा कि इससे ज्यादा तो साइकिल रिक्शा वाला कमा लेता है। वो बोला कि गर्मी के मौसम में साइकिल रिक्शा चलाने की हिम्मत नहीं होती साथ ही और साथी भी ऑटो ही चलाते थे इसलिए ये ही काम शुरू किया। मैंने अशोक से फिर पूछना शुरू किया कि ठेकेदार किस बात के पैसे लेता है। अशोक बोला कि ये पैसे तो केवल ऑटो चलाने के हैं अगर नहीं दिए तो चौराहे पर खड़ा ही नहीं होने देते। लेकिन चौराहे पर पार्किंग के इतने पैसे कुछ समझ में नहीं आए। कुछ ही देर में मुझे पता चल चुका था कि मैंने अशोक की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।

अशोक ने बताया कि ये कोई पार्किंग का टैक्स नहीं है ये तो गुंडागर्दी है जो पुलिस और प्रशासन की देख रेख में आगरा की सड़कों पर चलती है। अशोक ने बताया कि कुछ लोग हैं जो मिलकर ये गुंडागर्दी करते हैं। इन चार-पांच लोगों ने आगरा कुछ भागों में नगर निगम के पार्किंग के ठेके ले रखे हैं और उसके अलावा ऑटो वालों से गुंडा टैक्स भी वसूल करते हैं। उसने बताया कि पैसा नहीं देने पर इनके लोग चौराहे से तो भगा ही देते हैं ऊपर से मारपीट भी करते हैं। मैंने कहा कि पुलिस वाले तब कुछ नहीं बोलते तो अशोक बोला कि बैठते तो ये पुलिस वालों के साथ ही हैं फिर पुलिस वाले भी कुछ क्यों बोलने लगे। अब जरा सोचिए कि आगरा में ट्रैफिक के लिए समस्या बनने वाले ये ऑटो सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों की संख्या में हैं तो रोजाना कि इस गुंडा टैक्स से कितनी बड़ी अवैध वसूली खुले आम चल रही है।
अशोक से पूछने के लिए अब काफी सारे सवाल खड़े हो रहे थे। मैंने कहा कि कब से चल रही है ये वसूली तो उसने बताया कि ये तो हमेशा से चल रही है। मैंने कहा कि क्या सरकार के बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ा, क्या उसके बाद ठेकेदार भी नहीं बदला तो उसने बताया कि बसपा की सरकार हो या सपा की इन ठेकेदारों की गुंडागर्दी हमेशा से चल रही है औऱ चलती ही रहेगी। अजूबे की बात तो ये है कि ऑटो वालों के बारे में काफी सारी बातें यहां के अखबारों में निकलती हैं लेकिन इस अवैध वसूली के बारे में किसी अखबार ने आज तक कुछ भी नहीं छापा है। अब बताइये, आम मेहनतकश आदमी के ऊपर क्या फर्क पड़ता है। इसे सकारात्मक रूप में लीजिए... कोई मेहनत करके अपने बच्चे पालने की कोशिश कर रहा है लेकिन फिर भी उसकी मेहनत को प्रशासन औऱ गुंडे खा रहे हैं... ये फर्क पड़ता है। बाकी हमारे, आपके, नेता, अफसर और अखबार वालों के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता।
उतरते समय मैंने अशोक को दस रुपये दिए तो उसने मुझसे पूछा कि भाई क्या आप पत्रकार हैं? मैंने कहा.. नहीं.....मैं बेकार हूं।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
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गुरुवार, 22 मार्च 2012

आखिर भारत का समर्थन क्यों करें पड़ौसी देश


आखिर भारत का समर्थन क्यों करें पड़ौसी देश

भारत को यह समझना चाहिए कि अमेरिका की प्रैग्मेटिज्म पर आधारित नीति कभी उसे भी सवालों के घेरे में खड़ा कर सकती है। सोचिए क्या उस स्थिति में भारत के पक्ष में उसका कोई पड़ौसी खड़ा होगा।
भारत की विदेश नीति हमेशा से ही ढुल मुल रही है। उसी का एक और उदाहरण आज सामने आ गया जब पश्चिमी देशों द्वारा श्रीलंका के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में लाए गए प्रस्ताव का भारत ने समर्थन कर दिया। यह प्रस्ताव श्रीलंका की सरकार द्वारा लिबरेशन टाइगर आफ तमिल ईलम (एलटीटीई) के खिलाफ लड़े गए युद्ध में मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाता है। इस प्रस्ताव का चीन और रूस ने विरोध किया है। भारत सरकार की इस प्रस्ताव का समर्थन करने की एक मजबूरी ये थी कि केंद्र सरकार में सहयोगी दल द्रमुक के प्रमुख करुणानिधि ने सरकार द्वारा इस प्रस्ताव का विरोध किए जाने की स्थिति में अपने मंत्रियों को वापस बुला लेने की धमकी दे रखी थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत द्वारा श्रीलंका के खिलाफ दिए गए वोट को उचित ठहराने की कोशिश में कहा है कि तमिल लोगों को न्याय दिलाने की कोशिश के तहत ये कदम उठाया गया है। क्या वास्तव में बात यहीं खत्म हो जाती है।

क्या विदेश नीति के हिसाब से यही सही कदम था
जो लोग ये कहते हैं कि विदेश नीति के अनुसार यह एक सही कदम था, मैं उनसे सहमत नहीं हो सकता। भारत की शिकायत है कि पड़ौसी देश उसे वो दर्जा नहीं देते जो कि उसे मिलना चाहिए। जबकि सही बात तो यह है कि भारत का रवैया ही पड़ौसी देशों के प्रति बड़प्पन का नहीं रहता। इससे पहले विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ये कह चुके थे कि तमिल लोगों के पुनर्वास और अधिकारों की रक्षा करने के लिए श्रीलंका ने बहुत से कदम उठाए हैं और भारत उनसे संतुष्ट है। फिर ऐसी स्थिति में एक अंतर्रराष्ट्रीय मंच पर श्रीलंका से ये धोखा क्या केवल घरेलू राजनीति को ध्यान में रख कर किया गया। लगता तो ऐसी ही है, ये शर्मनाक बात है कि श्रीलंका के विदेश मंत्री ने भी ये बयान दिया है कि देशों ने वास्तविक स्थिति को न समझते हुए केवल आंतरिक राजनीति के आधार पर इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। देखा जाए तो यह परोक्ष रूप से श्रीलंकाई मंत्री का भारत की ओर इशारा था।

गलत कूटनीतिक का परिचायक
भारत के कई रक्षा विशेषज्ञ और कूटनीतिज्ञ ये बात पहले से कहते रहे हैं कि चीन, भारत के पड़ौसी देशों में पैर जमाता जा रहा है। उन्होंने कई बार सचेत किया है कि ये चीन के मैत्रीपूर्ण संबंध नहीं बल्कि भारत को घेरने के लिए उठाए गए कदमों में से एक हैं। वैसे भी भारत चीन की विस्तारवादी नीतियों से काफी हद तक आशंकित रहता है। पाकिस्तान और नेपाल में पहले ही चीन एक सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुका है। जहां तक श्रीलंका का प्रश्न है, पहले ही चीन वहां पर कई विकास कार्यों में संलग्न है। हम्मनतोता तट के चीन की सहायता से विकास पर भारतीय रक्षा विशेषज्ञ पहले ही कई बार सरकार को चेता चुके हैं कि यह चीन की हिंद महासागर में सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराने की एक कोशिश है। भारत के हालिया कदम के बाद अगर श्रीलंका की नजदीकियां चीन के साथ और बढ़ती हैं तो हमें इस पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर, इस फैसले ने भारत के भी श्रीलंका में किए तमाम विकास कार्यों पर पानी फेर दिया है। भारत ने अपनी कूटनीति के तहत तमिलों के पुनर्वास से लेकर श्रीलंका में रेलवे के विकास तक काफी निवेश किया था लेकिन अब उसके सकारात्मक प्रभाव के बारे में सोचना बेमानी है।

आतंकवाद पर दोहरा रवैया
भारत हमेशा अमेरिका और पाकिस्तान पर आतंकवाद को लेकर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाता रहा है। भारत के हालिया फैसले को किस रूप में देखा जाए यह विचारणीय प्रश्न है। एलटीटीई विश्व का एक कुख्यात आतंकवादी संगठन रहा है। इसने केवल श्रीलंका को ही नहीं बल्कि भारत को भी नुकसान पहुंचाया है। अगर एक बार को तमिल लोगों की भावनाओं का ख्याल कर भी लें वहां तक तो सही है, लेकिन जब एलटीटीई ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की नृशंस हत्या कर दी तब क्या उस स्थिति में भी भारत को श्रीलंकाई तमिल संगठन का समर्थन करना चाहिए। मैं इतिहास की बहस में नहीं पड़ना चाहता कि राजीव गांधी का श्रीलंका में लिया गया फैसला सही था या नहीं। मूल प्रश्न ये है कि क्या एलटीटीई ने भारत में एक भारतीय नेता की इस प्रकार हत्या पर कोई सार्वजनिक अफसोस जताया या माफी मांगी। सही बात तो यह है कि एलटीटीई स्वयं पूरे श्रीलंकाई तमिलों का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। वह सिर्फ श्रीलंका में अपने लाभ के लिए काम कर रहे एक आतंकी संगठन के सिवाय कुछ भी नहीं था।
दूसरे रूप में अगर देखें तो भारत हमेशा वैश्विक मंचों पर ये बात जोर शोर से उठाता रहा है कि सभी देशों को किसी भी रूप में आतंकवाद का समर्थन नहीं करना चाहिए। अमेरिका द्वारा अपनी कूटनीति के लिए पाकिस्तानी आतंकवाद को समर्थन देने पर हमारे भारतीय विचारक काफी आवाज उठाते रहे हैं लेकिन अगर अब भारत सरकार तमिलनाडु के कुछ ऐसे संगठन जो एलटीटीई से नजदीकी रखते हों उनके दबाव में एक लोकतांत्रिक सरकार का विरोध करती है तो यह कहां तक उचित है।  

क्या सवाल केवल मानवाधिकारों का है
जो लोग मानवाधिकारों के आधार पर अमेरिका समर्थित इस प्रस्ताव या भारत के इस पर लिए गए निर्णय को सही ठहराते हैं, उन्हें मानवाधिकारों को समूचे विश्व के परिपेक्ष्य में देखना चाहिए। सबसे अधिक हास्यास्पद तथ्य तो यह है कि ये प्रस्ताव ऐसे देशों के द्वारा लाया गया है जो खुद ही मानवाधिकारों का सबसे ज्यादा उल्लंघन करते हैं। अमेरिका अफगानिस्तान से ईराक तक और पाकिस्तान में खुले तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है। दूसरी ओर मान भी लिया जाए कि आतंकवाद के सफाए में श्रीलंकाई सेना ने कुछ मानवाधिकारों का उल्लंघन किया तो ऐसी स्थिति में भारत का सवाल उठाना शोभा नहीं देता। भारत के सशस्त्र बल खुद आतंकवाद और घरेलू अशांति की दुहाई देकर कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक और बिहार से लेकर आंध्र प्रदेश तक मानवाधिकारों का खुल के उल्लंघन करते हैं। ये बात सर्वविदित है कि युद्ध में सदैव मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। भारत को यह समझना चाहिए कि अमेरिका की प्रैग्मेटिज्म पर आधारित नीति कभी उसे भी सवालों के घेरे में खड़ा कर सकती है। सोचिए क्या उस स्थिति में भारत के पक्ष में उसका कोई पड़ौसी खड़ा होगा।
संक्षेप में, भारत को अपनी विदेश नीति के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। हालिया फैसला भारत को हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से कमजोर कर सकता है। देखा जाए तो मालदीव और श्रीलंका हिंद महासागर में भारत के महत्वपूर्ण सहयोगी साबित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में यह विचारणीय है कि भारत को घरेलू राजनीति से प्रभावित न होते हुए अपनी संप्रभुता और नैतिकता के आधार पर विदेश नीति का निर्धारण करना चाहिए।
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बुधवार, 18 जनवरी 2012

अकबर तो मुसलमान होता है!

अकबर तो मुसलमान होता है......
चौंकिए मत दोस्तों। मैं सांप्रदायिक नहीं हो गया हूं। ये शब्द मुझसे एक चाय बनाने वाले बच्चे ने कहे। भाड़ में जाए हमारा ये समाज और हमारी ये व्यवस्था जो एक बच्चे को कुछ ऐसा सिखाती है और भारत में सर्व धर्म समभाव की मिसाल कहे जाने वाले अकबर के नाम को केवल एक धर्म के साथ जोड़ दिया जाता है।
दरअसल, रात के समय जब तक काम खत्म होता है तब तक आफिस की कैंटीन बंद हो जाती है। और भूख लगने पर आफिस के बाहर के ढाबों पर परांठे और मैगी खाकर काम चलाना पड़ता है। इसी क्रम में आज रात भी लगभग 10 बजे में और मेरे एक पत्रकार मित्र कुछ खाने के लिये बाहर निकले। ढाबों पर देखा कि कॉल सेंटर में काम करने वालों की भीड़ लगी हुई थी। मैंने भी खाने के लिये आर्डर दे दिया। तब ढाबे के मालिक ने अपने लगभग 14 साल के बच्चे को काम पर लगा दिया। काफी देर हुई जब मेरा आर्डर नहीं आया तो मैंने जाकर देखा कि वो बच्चा मेरा ही परांठा बना रहा था। मैंने मजाकिया लहजे में प्यार से बच्चे से पूछा बेटा! क्या बीरबल की खिचड़ी पका रहे हो...। बच्चे ने मेरी तरफ देखा और बोला...अंकल , ये बीरबल की खिचड़ी क्या होती है? मैंने सोचा चलो आज इस बच्चे को ही कहानी सुना देते हैं। मैंने कहा बेटा, बीरबल अकरबर का एक मंत्री हुआ करता था। मैंने पूछा अकबर को जानते हो???? और वो बोला-    अकबर तो मुसलमान होता है।

मैंने बच्चे को तो समझा दिया कि अकबर का मतलब मुसलमान नहीं होता और ये भी बताया कि अकबर कौन था। लेकिन मन में कई उलझनें सी उठने लगीं। मैंने हमेशा की तरह उस बच्चे के पिता को बच्चों को पढ़ाने पर लंबा लैक्चर दे दिया और इतिश्री कर ली। बच्चे के पिता ने भी एक कान से बात सुन के दूसरे कान से निकाल दी। फिर भी मन शांत नहीं हुआ तो सोचा आप लोगों के साथ कुछ बातें कही जाएं तब शायद मन को ठंडक पहुंचे।

सवाल ये नहीं है कि बच्चा अकबर से अनजान था। सवाल ये है कि लगभग 14 साल की उम्र में भी बच्चा अकबर को क्यों नहीं जानता। और चलिए अकबर को भी छोड़िए, बच्चा स्कूल ही जा रहा होता तो कुछ तो जानता???
सरकार की सारी योजनाओं का पैसा जाता है नेता और अफसरों की जेब में लेकिन मंत्री जी कहते नहीं थकते कि शिक्षा का अधिकार लागू कर दिया गया। आखिर क्यों हम कुछ नहीं करते??? कब तक इस व्यवस्था पर भरोसा करते हुए कुछ होने का इंतजार करते रहेंगे। क्या हमारा भविष्य यही है जो सड़कों पर खड़ा परांठे बेचता हुआ बोले कि अकबर तो मुसलमान होता है।

एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित  हैं।