भोपाल गैस त्रासदी का जिन्न पुनः बोतल से बाहर आ गया है।हमेशा की तरह फिर से भारतीय राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर जारी हो गया है। देश के दोनों प्रमुख दल एक-दूसरे को जनता का अधिक हितैषी जताने के लिए प्रयासरत हैं। और बेचारे पीड़ित अभी भी अपनी आँखों से मिथाइल -आइसो साइनेट के खूनी आंसू रो रहे हैं।
वो तो भला हो आज की हाई स्पीड मीडिया का जो इतने सालों बाद पुनः मामले की छानबीन करने पर उतारू है। परत दर परत ये भेद खुलते जा रहे हैं कि राजनीति ने उसी जनता की किस प्रकार अवहेलना की है जो कि लोकतंत्र में राजनीति का आधार है।आखिर जिस जनता ने वोट दिया उसके प्रति जवाबदेही किसकी बनती है?
क्या अब पुनः सरकार के द्वारा मुआवजा देकर भोपाल की जनता को पूर्ण न्याय मिल पायेगा? क्या यही है हमारा लोकतंत्र जो स्वयं को समता और न्याय पर आधारित बताता है?
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