शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

शर्मिन्दा हूं मैं!


शर्मिन्दा हूं मैं!
हां, माफ कर दो मुझे, शर्मिन्दा हूं मैं
शर्मिन्दा हूं उसके लिए नहीं, जो ज़ुल्म उन जालिमों ने तुम पर ढहाए थे
बल्कि शर्मिन्दा हूं अपनी उस नामर्दी पर जो तुम्हें बचा न सकी।
याद है मुझे वाक़या उस दिन का
जब तुम काम से थकी घर जा रही थी
मासूम थीं तुम पूरे कपड़ों से ढकी,
लेकिन तब भी दरिन्दों की नजरों से तुम न थीं बची
शर्मिन्दा हूं मैं अपनी उस, उस आवाज़ के लिए
जो तुम्हें न बचा सकी उन वहशी नज़रों से!
याद है मुझे वो दिन
जब राखी खरीदने तुम बाजार में थी,
लेकिन तुम अकेली न थीं उस समाज में,
वहशियों की पूरी भीड़ थी उस बाजार में,
हां, घूर रहे थे तब भी वो तुम्हें
लड़की नहीं एक मांस का टुकड़ा समझे थे,
जिन्दा नहीं हाड़ मांस का एक पुतला समझे थे!
हां, माफ कर दो, शर्मिन्दा हूं मैं
ये सच है, शर्म से गढ़ गया था मैं,
अपने दोस्तों के बीच ही अकेला पड़ गया था मैं।
उनके मन की वहशियत भी समझ गया था मैं,
कलेजा मेरे मुंह में था,
फिर भी जिन्दा होकर मुर्दा ही बना रहा मैं।

हां, ये सच है कि कल रात दो आंसू मैंने भी बहाए थे
जो जख्म तुमने खाए, दिल पर मैंने भी वो पाए थे,
तुम्हारे दर्द से अब ये जान पाया हूं मैं,
शायद अब अपनी खोयी मर्दानगी ढूंढ पाया हूं मैं।
वादा है मेरा तुमसे कि अब रहोगी तुम आजाद,
दरिन्दों को अब बता दूंगा मैं उनकी औकात
शायद फिर भी न दर्द होगा तुम्हारा कम,
शर्मिन्दा हूं मैं मुझे माफ कर देना तुम।
 -नीरज(19/12/2012)
माफ करें लेकिन इस बार आपके विचारों की कोई ज़रूरत नहीं है.....
केवल एक बेहतर भविष्य की उम्मीद है!