रविवार, 3 जून 2012

जनसेवकों के सम्मान में समर्पित



 " हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"


ये हमारे भारतीय संविधान की प्रस्तावना है। खाली समय में मेरे द्वारा लिखी गई किसी भी बकवास को पढ़ने से पहले इसे ध्यान से पूरा जरूर पढ़ें। आप पूछेंगे क्यों? तो उत्तर ये है कि इस प्रस्तावना में भारतीय संविधान का पूरा सार है। इसमें बताया गया है कि आखिर हमारी व्यवस्था कैसे चलेगी। वैसे, देखा जाए तो व्यवस्था तो ऊपर दी गई तारीख 26 नवम्बर, 1949 से ही चल रही है लेकिन जांच पड़ताल में क्या जाता है। दरअसल, ये फालतू बातें दिमाग में तब आईं जब समाचार में पढ़ने को मिला कि भारत सरकार की वित्तीय अवस्था ठीक नहीं है और सरकारी खर्चों को कम करने की कवायद शुरू की जा चुकी है। सवाल एक और था कि सरकार के मुताबिक पिछले कई सालों में देश ने अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति की है, लोगों की आमदनी में बढ़ोत्तरी हुई है, गरीबी कम हुई है तो आखिर सरकार की हालत कैसे पतली हो गई। खैर, इतनी लम्बी आर्थिक बहस में जाने का मेरा कोई इरादा नहीं है क्योंकि मनमोहन सिंह इस देश के प्रधानमंत्री हैं बल्कि मेरी ये बकवास तो जनसेवकों को समर्पित है न कि मेरे जैसे ठलुओं के लिए जो इसे लिखते हैं और फिर उसे दूसरों को पढ़ने के लिए पेश भी करते हैं।
हमारे इस संविधान में ये निर्धारित किया गया कि कौन क्या काम करेगा। जनता को सर्वोपरि रखा गया और उससे कहा गया कि अपनी सेवा के लिए आप सेवक चुनें वो लोकसेवक या जनसेवक होंगे। ये जनसेवक आपके विकास औऱ हितों के लिए काम करेंगे। जनता ने कहा ठीक है, इस व्यवस्था को चलाने के लिए हम टैक्स (कर) देंगे और जनसेवक हमारे विकास के लिए कानून बनाएंगे। इन सभी माननीय जनसेवकों के लिए संसद बनाई गई और वहीं से जनता का भाग्य निर्धारित होना शुरू हो गया। समय बीतता गया और जनसेवक अपनी सेवा में लगे रहे जिससे हमारे देश ने अभूतपूर्व प्रगति की लेकिन जनसेवकों को क्या मिला। चलिए, अब ये जान लेते हैं कि जनता के लिए धन की कमी का रोना रोने वाली सरकार और कानून बनाने वाले बेचारे जनसेवकों को आखिर मिल क्या रहा है।
- बेचारे जनसेवकों (सांसदों) की महीने की पगार केवल 12 हजार रुपये है।, इसके अलावा
- जनसेवकों को कार्यालय के खर्चे के लिए 14 हजार रुपये हर महीने मिलते हैं,
- निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 10 हजार रुपये प्रतिमाह,
- रोजाना की यात्रा का खर्चा,
- रेलवे की प्रथम श्रेणी में साल भर के दौरान अनियमित यात्राएं मुफ्त,
- बिजनेस क्लास में साल भर के दौरान 40 हवाई यात्राएं मुफ्त,
- दो हजार रुपये प्रतिमाह के किराए पर दिल्ली के सबसे महंगे इलाके में आलीशान बंगला,
- हर साल 50 हजार यूनिट मुफ्त बिजली,
- साल भर मुफ्त पानी,
- टी.वी., फ्रिज, सोफा आदि से सुसज्जित बंगले का मुफ्त रखरखाव,
- तीन टेलीफोन नंबर और उन पर साल भर की एक लाख 70 हजार कॉल मुफ्त,
- मुफ्त चिकित्सा सुविधा आदि।
कुल मिलाकर, एक जनसेवक का सालाना खर्च 32 लाख रुपये (2.66 लाख रुपये प्रतिमाह) और इसमें नौकरों और सुरक्षा का खर्च नहीं जोड़ा गया है। इस हिसाब से हमारे 543 जनसेवकों का कुल सालाना खर्च जान लें तो और भी बेहतर होगा। ये है लगभग 868 करोड़ रुपये। बताइये भला, इतने तीव्र प्रगतिशील देश में जनसेवकों की मुफलिसी का ये आलम है। वैसे इस खर्च में देश के सभी सरकारी अधिकारियों (आईएएस से लेकर राज्य कर्मचारियों तक) के खर्च भी जोड़ दिए जाएं तो आपको पता चलेगा कि जनता के विकास में अभूतपूर्व भागीदारी के लिए कितना कम सरकारी खर्च किया जा रहा है। आइये, अब जरा इनकी सेवाओं से जनता का कितना विकास हुआ इसको भी सरसरी नजरों से देख लेते हैं।
सरकार के मुताबिक अगर आप 30 रुपये रोज कमाते हैं तो आप गरीब नहीं हैं। तब भी आधी से ज्यादा जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है, हालांकि सरकार इसे काफी कम बताने का प्रयास करती रहती है। जरा सोचिए जब भारत में इतनी बड़ी जनसंख्या साइकिल पर चलने की भी हैसियत नहीं रखती तो कम से कम जनसेवकों को बिजनेस क्लास में जनता के पैसे पर मुफ्त हवाई यात्रा तो मिलनी ही चाहिए। उस पर भी हमारे देश में भ्रष्टाचार जैसी कोई समस्या नहीं है। जनता के सारे संसाधन उसी की सेवा में समर्पित हैं। इस प्रकार एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य अर्थात भारत की व्यवस्था चलती है।
   
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
---------------------------------आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं-------------------------------------------