पत्रकारिता की पहली
कक्षा में न्यूज़ राइटिंग सिखाते हैं मतलब 5W1H (What, Where, Why, When, Whom and How) . फिर जब अगले दर्जे में पहुंचते हैं तब Objectivity, Media ethics, Media law जैसे भारी भरकम टर्म से आपका सामना पड़ता है।
फिर अचानक एक गेस्ट फैकल्टी आकर आपको बताते हैं कि पत्रकार कभी निष्पक्ष नहीं हो
सकता। उसकी भी भावनाएं हैं, विचार हैं, राजनीतिक विचारधारा है... ब्ला ब्ला
ब्ला...। फिर अखबारों और चैनलों को संचालित करने वाले
कॉर्पोरेट्स हैं। पत्रकार नौकर हैं और कॉर्पोरेट्स मालिक। कॉर्पोरेट्स की भी अपनी
राजनीतिक विचारधारा है। उसके हिसाब से चलो तो नौकरी है... न चलो तो लात मारकर बाहर
फैंके जाओगे।
पत्रकारिता में एक
नयी विधा है जिसे Advertising and
Public Relation के नाम से जाना जाता है। हिन्दी में इसका मतलब
है कि पैसा और विज्ञापन पाने के लिये किसी भी व्यक्ति या संस्था से Objectivity का समझौता करना। ये विधा पूर्णरूपेण पूंजीवाद की पैदाइश है। और फिर ऐसी विधा
को पढ़कर आये विद्यार्थी से आप निष्पक्षता की उम्मीद करते हैं।
एक ऐसा बेचारा जिसे
पूरी तरह भारत के इतिहास, भूगोल, संविधान व व्यवस्था, संस्कृति और दुनिया की कुछ
भी जानकारी नहीं है, उसे कई लाख रुपये में एक डिग्री-डिप्लोमा थमाकर पत्रकार बना
दिया जाता है। वो बेचारा बाजार में आता है और बाजारू का बन जाता है।
वैसे भी अब तो खुला
खेल फर्ररुख़ाबादी है... मतलब चुनावों से लेकर बाजार में अपने प्रॉडक्ट को जमाने
तक सब पत्रकारिता की इसी बदनाम विधा का इस्तेमाल करते हैं। करते तो हैं और फायदा
भी कमाते हैं लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान कौन सहता है? नुकसान सहता है वो पत्रकार
जिसे दल्ला, दलाल, चमचा और पता नहीं किन किन गंदे नामों से नवाज़ा जाता है।
बरखा दत्त राडिया
टेप में दागी है तो सुधीर चौधरी भी उमा खुराना के फर्जी स्टिंग से लेकर जिंदल से
दलाली मांगने तक में दागी है। लेकिन जनता अपने हिसाब से सबको देशभक्त या देशद्रोही
की कैटेगरी में रख लेती है।
ये तो बहुत बड़े नाम
हैं जो दो जून की रोटी के लिये नौकरी न भी करें तो भूखे नहीं मरेंगे लेकिन न्यूज़
रूम में 8 से 10 घंटे खटते उस पत्रकार को कोई नहीं जानता जो अखबारों और चैनलों के
पैकेज बनाता है। ख़ैर, इसके लिये भी ख़ुद पत्रकार ही ज़िम्मेदार हैं जो उन्होंने
अपने आपको गुलाम बनाने के लिये किसी को इतना अधिकार दिया हुआ है।
मेरा पहले भी मानना
था और आज भी मानना है कि वास्तव में कोई भी व्यक्ति पत्रकार स्वभावतः होता है। उसे
किसी Journalism and Mass
Communication टाइप के कोर्स करने
की ज़रूरत नहीं होती। मैंने ये डिग्री ली है और मुझे नहीं लगता कि इस पत्रकारिता
के कोर्स को करने के बाद मैं एक बेहतर पत्रकार बन पाया हूं।
सच कह रहे हैं मित्र, डिग्री के कोई मायने नहीं। हम लोग तो पैदायशी मीडियाकर्मी हैं। मैं जब कक्षा छह-सात में था तो रेडियो पर बोलने की प्रैक्टिस करता था। बाद में दुकानों के पोस्टर को उसी अंदाज में पढ़ने लगा। इसी तरह अखबार की हेडिंग को और अच्छा बताता दूसरों को, ऐसे नहीं ये होती हेडिंग तो ज्यादा धमाकेदार होती।
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