बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

देश की गरिमा को देश ने ही न समझा



सोचिए कि क्रिकेट वर्ल्ड कप खेलने वाले व्यक्ति के लिए न तो देश में कोई नौकरी हो न ही रेल में सफर करने के लिए सीट। ये मज़ाक नहीं है लेकिन सोचिए कि आप ट्रेन में सफर कर रहे हों और आपके पास युवराज सिंह, धोनी या सचिन बैठा हो जबकि आपके पास सोने के लिए सीट हो और उसके पास नहीं। अविश्वसनीय सा लगता है न? लेकिन ये सच है। जब मैं अपनी सीट पर आराम से लेटा हुआ था तब एक घुंघराले बालों वाली हष्ट-पुष्ट लड़की जो देखने से ही खिलाड़ी लग रही थी, एक फौजी के बक्से (टिन के बॉक्स) पर बैठी लखनऊ से दिल्ली तक का रात का सफर कर रही थी।
क्या आप गरिमा चौधरी को जानते हैं? हो सकता है जानते हों, ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उसे मैं नहीं जानता था। चलिए गूगल अंकल का सहारा ले लेते हैं। देखिए और फिर मैं इसी गरिमा के बारे में आपसे कुछ कहना चाहता हूं।
जिन्होंने देख लिया हो तो ठीक नहीं तो जिन्होंने नहीं देखा हो वो ये जान लें कि गरिमा चौधरी भारत की वो बेटी है जिसने ओलम्पिक खेलों में जूडो के लिए देश का प्रतिनिधित्व किया है।

वैसे, मैं खेलों के प्रति लगभग उदासीन रवैया रखने वाला इन्सान हूं लेकिन गरिमा की चमत्कारिक शख़्सियत ने मुझे न केवल परिस्थितियों पर सोचने को बल्कि लिखने को भी मजबूर कर दिया। फिर भी मैं ये नहीं चाहता कि आप उस ताकतवर लड़की के लिए करुणा के भाव लाएं क्योंकि वो एक लौहस्त्री है जो हर कठिनाई को कभी भी उठाकर पटखनी देने की ताकत रखती है। लम्बी-चौड़ी कद काठी की गरिमा चौधरी उत्तर प्रदेश के मेरठ के पास बुलंदशहर नामक जिले की रहने वाली हैं और एक पारम्परिक जाट परिवार से ताल्लुक रखती हैं। गरिमा जूडो की अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं और ब्लैक बेल्ट धारक हैं। गरिमा के बारे में कुछ ख़ास तथ्य भी हैं जैसे गरिमा ने साढ़े तेरह साल की उम्र में वरिष्ठ वर्ग से खेलना शुरू कर दिया था, पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच 14 साल की उम्र में खेला और ओलम्पिक और कॉमनवेल्थ खेलों में गरिमा ने जूडो में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। गरिमा भारत की महान मुक्केबाज मैरी कॉम और पहलवान सुशील कुमार की बहुत अच्छी दोस्त भी हैं।
मैं ये सारे तथ्य आपके सामने इसलिए रख पा रहा हूं कि गरिमा को मैंने भारतीय रेलवे में खड़े होकर सफर करते देखा है। दरअसल, मेरे बिहार से वापसी के सफर के दौरान गरिमा लखनऊ से रेलगाड़ी में सवार हुई थीं और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पटियाला स्थिति कैंप में ट्रेनिंग के लिए जा रही थीं। पहले मुझे लगा कि ये किसी कॉलेज की लड़कियां हैं जो इन्टरकॉलेज कम्पटीशन में भाग लेने को किसी दूसरे शहर जा रहीं हैं। साथ में बैठे भाई साहब के साथ बिहार की राजनीति से चर्चा शुरू हुई जो भ्रष्टाचार से होती हुई कलमाडी और खेलों तक जा पहुंची। मेरे आईपीएल के खिलाफ बोलने पर गरिमा भी बहस में शामिल हो गईं। दरअसल, गरिमा के भीतर एक लावा था जो क्रिकेट और खेलों में व्याप्त भाष्टाचार के नाम पर फूट पड़ा।
गरिमा ने ऐसी बहुत सी बाते कहीं जिन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता। गरिमा के दावों के मजबूत होने का भी एक ठोस कारण है, वो ये है कि गरिमा हमारे उन क्रिकेटरों जैसी नहीं हैं जो हाईस्कूल फेल हैं और टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हुए करोड़ों में खेल रहे हैं। गरिमा की उम्र अभी भी कम है और वो खेल के साथ पढ़ाई भी करती हैं। गरिमा ग्रेजुएट हैं और आगे भी पढ़ना चाहती हैं। गरिमा के साथ जूडो की एक और खूबसूरत खिलाड़ी से मेरी मुलाकात हुई। इनका नाम नयना बी. पॉल है और ये केरल की रहने वाली हैं। आत्मविश्वास से भरी नयना दिल्ली विश्वविद्यालय के जीसस एंड मैरी कॉलेज से ग्रेजुएट हैं। इन खिलाड़ियों ने जिस आत्मविश्वास के साथ मुझे भारत में खेलों के संचालन और राजनीति के बारे में बताया उसे सुनकर कोई भी कह सकता है कि किसी बेहतरीन अनपढ़ क्रिकेटर से ये लड़कियां कहीं आगे हैं। ये मुझे आधुनिक भारत में नारी शक्ति और सशक्तिकरण की साक्षात प्रतिमा नज़र आ रहीं थी।
व्यक्तिगत रूप से, मैं क्रिकेट तो क्या किसी भी खेल के खिलाफ नहीं हूं लेकिन गरिमा और नयना ने बताया कि किस तरह भारत की अंध क्रिकेट भक्त जनता और राजनीति के कारण उन्हें काबलियत होते हुए भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस बात को साबित करने के लिए दोनों जूडो खिलाड़ियों ने अपना नाम नहीं लिया बल्कि मैरी कॉम और अखिल कुमार का नाम लिया। उनकी दलीलें काफी हद तक ठीक थीं।
जब बात आगे बढ़ी तो मैंने गरिमा से काफी सारे सवाल पूछने शुरू कर दिए। गरिमा ने अपने बारे में काफी सारी ऐसी बातें भी बतायीं जिन्हें सुनकर आपको भी सरकारी नीतियों और नीति नियंताओं पर शर्म आ जाए। ख़ैर सारी बातें तो नहीं कह सकता लेकिन इतना तो आपको पता ही है कि भारत में जूडो की विराट कोहली.... नहीं (सॉरी गरिमा) भारत में जूडो की रफाल नडाल या मैसी या टाइगर वुड्स रेलवे में बिना किसी आरक्षण के खड़े-खड़े सफर करती हैं। शर्मनाक बात तो ये है कि उत्तर प्रदेश की रहने वाली गरिमा ने किसी समय यूपी की टीम से खेलना शुरू किया था लेकिन सरकार की लापरवाही और खिलाड़ियों के प्रति रवैये को देखते हुए गरिमा ने हरियाणा की टीम से खेलना शुरू कर दिया। हालांकि गरिमा का कहना है कि खाने और रहने की सरकार के तरफ से कोई कमी नहीं है लेकिन अगर कोई खिलाड़ी खेलने के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियां भी उठाना चाहता है तो उसके लिए खेलों में कोई मौका नहीं है।
मैंने गरिमा से ये भी जानना चाहा कि ओलम्पिक खेलों में खेलने के बाद क्या उन्हें सरकारी नौकरी मिली? इस पर गरिमा का कहना था कि वे कुछ ही दिन पहले हरियाणा पुलिस का इंटरव्यू देकर आयी हैं। मैंने गरिमा को मुबारकबाद दी और कहा कि अब तो शायद डीएसपी की वर्दी में ही गरिमा से मुलाकात होगी तो गरिमा ने उदास होकर बोला कि उन्हें इन्सपेक्टर की पोस्ट दी जा रही है। यहीं से देखिए कि क्रिकेट और अन्य खेलों में किस प्रकार खिलाड़ियों में विभेद किया जाता है। जहां एक तरफ अशिक्षित या नकल कर पास हुए क्रिकेटरों को डीएसपी या कोई ऊंची पोस्ट दी जाती है वहीं ओलम्पिक खेल चुकी ग्रेजुएट गरिमा को इन्सपेक्टर की पोस्ट से ही संतुष्टी करनी पड़ रही है।
मेरे लिए गरिमा नाम की लड़की एक और चीज़ के लिए महत्वपूर्ण है। गरिमा पारम्परिक जाट परिवार से ताल्लुक रखती हैं और उन्हें खेल में अपने परिवार का पूरा समर्थन हासिल है। गरिमा का कहना है कि जब तक वे खेलों में ज्यादा आगे नहीं बढ़ीं थीं तब उनके आस-पास के लोग उनके माता पिता का मजाक उड़ाते थे लेकिन माता पिता के विश्वास के कारण ही गरिमा आज इतनी ऊंचाइयों तक पहुंच पाई हैं। गरिमा के माता पिता उन लोगों के लिए और खुद ऑनर किलिंग और दकियानूसी विचारों के लिए मशहूर जाट समुदाय के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं जो बेटों के सामने बेटियों को कमतर समझते हैं।
गरिमा ने मुझे पत्रकार समझते हुए ये निवेदन किया कि मैं भी कभी खिलाड़ियों के ऊपर लिखूं और दुनियां को उनकी सच्चाई से रूबरू कराऊं। मैं गरिमा को कोई बड़ा वादा तो न कर सका लेकिन उनके उज्जवल भविष्य की कामना जरूर की। मेरे पत्रकार दोस्त संजय ने गरिमा की खेल भावना को नमन करते हुए अपनी सीट उन्हें दे दी और कुछ घंटों में हम दिल्ली पहुंच गए। गरिमा को मैंने नहीं जगाया क्योंकि मैं उसकी आंखों में पल रहे सपनों को नहीं तोड़ना चाहता लेकिन कई महीनों से चोट से जूझ रही गरिमा के लिए एक बेहतर भविष्य की कामना तो कर ही सकता हूं।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं।