आज खाली वक़्त में टी.वी.पर चैनल ट्यून करने लगा अचानक ही लगा कि एक हलकी सी झलक पुरानी अदाकारा नर्गिस की देखी है। मैं वहीँ रुक गया, फिल्म का नाम था 'श्री ४२०'। फिर देखने लगा और समझने की कोशिश करने लगा कि भारतीय सिनेमा में क्या अंतर आया है।
जब वो फिल्म देखी तो पहली बार लगा कि अब शायद बोलीवुड मौलिकता खो चुका है। फिल्म एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो उपभोगवादी संस्कृति और धन की चाहत में अपनी मौलिक पहचान भूल जाता है। लेकिन प्यार उसके भीतर की सच्चाई को मरने नहीं देता है। वो वापस फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए व्याकुल हो उठता है। अगर आपको फिल्म की कहानी का अंदाज़ा हो गया है तो खुद ही देखिये की फिल्म का नाम कितना सही रखा गया है।
फिल्म का गीत-संगीत आज भी लोगों की जुबां पर है, आज भी अन्ताक्षरी में इस फिल्म के गीत याद आते हैं।इससे आप फिल्म की मौलिकता का अंदाज़ा आसानी से लगा सकते हैं। मनुष्य कि मनोदशा का सटीक चित्रण करती है यह फिल्म।
पुनः यदि मौलिकता की बात कि जाए तो भारतीय फ़िल्में ही नहीं समाचार जगत भी याद आ जाता है। कभी दस वर्ष पुरानी कोई भी रिपोर्ट इंटरनेट पर देख लीजिये समझ आ जायेगा कि समाचार में मौलिक क्या है। पता नहीं भारतीय मीडिया जगत मौलिकता पर पुनः कब वापस आएगा?
एक बेहतर भविष्य कि उम्मीद के साथ!
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