शनिवार, 6 अगस्त 2011

पत्रकारिता में निष्पक्षता का आभाव|

कहते हैं मीडिया आम जनता के लिए आँख और कान का कार्य करती है| लेकिन सोचिये अगर आपके आँख और कान काम करना बंद कर दें या फिर आपको सही सूचना प्रदान करना बंद कर दें तो क्या तब भी आप अपना जीवन आसानी से गुज़ार पायेंगे? ज़रा कल्पना कीजिये ऐसी स्थिति की, ठीक यही स्थिति मीडिया की है; अगर लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को सही सूचना प्राप्त न हो तो क्या व्यवस्था सही रूप से चल सकती है?

जब किसी छात्र को पत्रकारिता में जाने के लिए तैयार किया जाता है तो उसे बड़े ही जोर देकर ये बताया जाता है कि पत्रकारिता में निष्पक्ष होना बहुत ज़रूरी है इसकी अनुपस्थिति में न केवल हम अपने पेशे के साथ अन्याय करते हैं बल्कि जनता को गलत सूचना देकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की हत्या भी करते हैं| लेकिन क्या वास्तव में मीडिया में निष्पक्षता अभी बाकी है?


मैं अभी हाल ही का एक उदाहरण आपको देता हूँ| भारत में टीवी के काफी पुराने, सम्मानित और जाने माने पत्रकार हिंदी के एक प्रसिद्द चैनल पर रोज़ रात अपनी एक समाचार पत्रिका पेश करते हैं| इसमें ज़्यादातर उस दिन सुर्ख़ियों में रही खबर को प्रमुख मुद्दा बनाया जाता है| किसी एक खास मेहमान को भी चर्चा के लिए बुलाया जाता है| चूँकि ये काफी वरिष्ठ पत्रकार हैं इसलिए ये अक्सर किस्से-कहानियों या मुहावरों से अपनी राय भी रखते हैं| अपने ०२, अगस्त के कार्यक्रम में इन्होने संसद के मानसून सत्र में हुए हंगामे पर चर्चा की, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता को भी आमंत्रित किया गया| पत्रकार महोदय ने सवाल उठाया कि आखिर विपक्षी दल एक स्वस्थ चर्चा करने की जगह हो हल्ला क्यों मचाते हैं| नेता जी ने कहा कि आज की तारीख में भ्रष्टाचार और मंहगाई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर लोकहित के लिए सरकार का ध्यानआकर्षण करना और और कार्रवाई के लिए बाध्य करना आवश्यक है लेकिन वर्तमान सरकार इन मुद्दों पर चर्चा करने से बचना चाह रही है| नेता जी ने आगे ये भी जोड़ा कि जब सरकार बहरी हो जाए तो उसे सुनाने के लिए चिल्लना भी पड़ता है| 

पत्रकार महोदय ने नेता जी की पार्टी पर सीधे टिप्पणी करते हुए कहा कि आपकी पार्टी ही शोर करती है, संसद की कार्रवाई में बाधा डालती है और संसद के समय और जनता के धन की बर्बादी करती है| पत्रकार महोदय ने ब्रिटिश संसद का हवाला देते हुए शोर मचाकर अपनी बात रखने के तरीके को असंसदीय मानकर ख़ारिज कर दिया|


अगले दिन महोदय फिर से अपना कार्यक्रम लेकर जनता के सम्मुख उपस्थित हुए| ०३, अगस्त के इस कार्यक्रम की शुरुआत संसद भवन में नव-नियुक्त रेलमंत्री को ६ नंबर कमरा न मिलने पर हुई नौटंकी को लेकर हुई| कमरा खाली ना होने पर रेलमंत्री ६ नंबर कमरे के बाहर ही बैठ गए और कमरा लेने के लिए प्रधानमन्त्री तक से बात करके आये| अंततः रेलमंत्री को उनका कमरा मिल गया| इस घटना पर पत्रकार महोदय की टिप्पणी थी कि बहरी व्यवस्था में अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए चिल्लाना पड़ता है, यह स्थिति एक केंद्रीय मंत्री की है तो सोचिये जनता की क्या स्थिति होती होगी जब व्यवस्था में उसकी सुनवाई नहीं होती हो| साथ ही जनता को धरना प्रदर्शन करने पर पुलिस के लात-घूंसे और डंडे भी खाने पड़ते हैं|


अब इन दोनों घटनाओं का विश्लेषण कीजिये और बताइए कि- 
१. क्या पत्रकार महोदय ने अपनी ही बात को नहीं ख़ारिज नहीं कर दिया?
२. क्या पत्रकार महोदय ने निष्पक्ष ना रहते हुए अपनी विचारधारा और सरकार का बेवजह समर्थन नहीं किया?

हो सकता है कि आप में से काफी सारे लोग मेरे तर्कों का समर्थन न करें| मैं पत्रकार महोदय से पूछना चाहता हूँ कि ये बात सही है कि माननीय सांसदों को जनता के सरोकार से ज्यादा संसद में पार्टी लाइन और चेहरा चमकाने के लिए शोर मचाना होता है लेकिन जब जनता पुलिस के डर से अपनी बात नहीं उठा सकती तो लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संसद ही ऐसा एक मात्र स्थान बचता है जहां पर जनता की बात और परेशानियों को न सिर्फ उठाया जा सकता है बल्कि उनका समाधान भी किया जा सकता है| ऐसे में जब कि सांसदों को जनता के हित की बात उठाने पर पुलिस के डंडों का भय नहीं रहता साथ ही जब सरकार निकम्मी और भ्रष्ट हो और जनहित पर चर्चा करना ही नहीं चाहती हो तो शोर मचाने में आखिर क्या बुरी बात है|
और तो और पत्रकार महोदय याद कीजिये एन.डी.ए. के शासनकाल में यही सरकार में बैठे सांसद शोर मचाकर संसद की कार्रवाई को बाधित करते थे जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी भी वर्तमान प्रधानमंत्री की ही भांति भावहीन मुद्रा में बैठे रहते थे|

हो सकता है कि मेरे तर्कों का ये मतलब लगाये जाए कि मैं मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का समर्थक हूँ| लेकिन ये बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं केवल लोकत्रांत्रिक मूल्यों का समर्थन करता हूँ तथा सरकार और भारतीय जनता पार्टी दोनों की ही विचारधारा और काम करने के तरीकों का समर्थन बिलकुल नहीं करता|  
आप लोगों में से जो भी चाहे मुझसे उन दोनों दिनों के कार्यक्रमों के वीडियो लिंक मांग सकता है| मैं लिंक मेल कर सकता हूँ|

  
अब सोचिये कि भारत में मीडिया के पुरोधा जब निष्पक्ष ही नहीं हैं तो मीडिया में आज लोकतान्त्रिक मूल्यों की क्या स्थिति होगी? सोचता तो ये हूँ कि ये बात दूर तक जानी चाहिए लेकिन क्या करूँ पत्रकार महोदय, मैं एक बेरोजगार पत्रकार हूँ, सांसद नहीं जो चिल्लाने लगूं| सड़क पर भी बैठ नहीं सकता इसलिए ब्लॉग लिख कर ही अपनी बात कह रहा हूँ|

एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं|