मंगलवार, 2 अगस्त 2016

कश्मीर तो कश्मीरियों के साथ ही मिलेगा


ताज़ा बवाल गिलानी की फोटो पर है। फोटो में गिलानी शायद श्रीनगर के डाउनटाउन में किसी दीवार पर ‘Go India Go Back’ पोत रहे हैं। खून खौल गया होगा राष्ट्रवादी पत्रकारों और लोगों का। सही भी है, कभी तो खौलना चाहिये क्योंकि अक्सर मजदूरों और किसानों के मुद्दों पर तो खौलता नहीं है। किसान जो हैं वो (बकौल तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार के कृषि मंत्री) नपुंसकता के कारण आत्महत्या करते हैं और पिछले कई साल से जेल में सड़ रहे मारूति के मनेसर वाले मजदूर देशद्रोही हैं। शायद कहीं जमानत मिल गयी तो मेक इन इंडिया फेल न हो जाये।
मेरा ये लेख मूर्खों के लिये नहीं है क्योंकि वैसे भी मैं मूर्खों के लिये नहीं लिखता। बाकी तथाकथित राष्ट्रवादी सरकारें वार्ताकार नियुक्त करती हैं, अलगाववादियों से बातें करती हैं, प्रधानमंत्री झप्पियां पाते हैं लेकिन दो टाइप के लोग या तो मरते हैं या अपंग होते हैं। पहले कश्मीरी और दूसरे हमारे जवान। लेकिन लोगों से बात नहीं होती...। होती है क्या???
समस्या यहीं हैं बस। कश्मीर के अलगाववादी, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, बीजेपी या कांग्रेस उन लोगों का प्रतिनितिधित्व करते ही नहीं हैं जो कश्मीरी हैं। वार्ताकार नियुक्त करने से समस्या तब हल हो सकती है जबकि वार्ताकार लोगों के बीच जाकर बात करें, कि वार्ताकार जो कि ऑफिस में बैठा बुढ़ऊ है, अपना बुढ़ापा काट रहा है और तुम उसके बुढ़ापे के जोर पर राष्ट्रवादी भावनाओं में चौड़े हुए जा रहे हो।
कई साल पहले मेरे एक कश्मीरी दोस्त का कहना था कि गिलानी, मलिक, फारूख़, मुफ्ती, अब्दुल्ला... या और कोई भी हों, इन्हें कभी खाने और बच्चों की पढ़ाई की परेशानी नहीं होगी क्योंकि दोनों तरफ की सरकारें इनकी झोलियां भर भर के अपनी पॉलिटिक्स सेट करती हैं। लेकिन आम कश्मीरी कहां जा कर मर जाये... हिंदुस्तान के लोग हमें चाहते नहीं और पाकिस्तान के लोग बस हमारी जमीनें चाहते हैं...। और देखो, फिर मैंने पूछ भी लिया कि जब तुम्हारे पास सरकार चुनने का अधिकार है तो अपने विधायकों से जवाब क्यों नहीं लेते। तो जवाब में मुझे अस्सी के दशक के चुनाव पर सवाल पूछ लिया गया, मैं जवाब देने की स्थिति में नहीं था। मैंने एक और ट्रंप कार्ड अपने तथाकथित राष्ट्रवादियों की तरफ से मारा था कि जब कश्मीरी पंडितों को भगाया जा रहा था तब तुम कहां थे? वो बोला, जब तुम्हारे घर में रात में बंदूक लेकर कुछ लोग घुस आते हैं तो तुम क्या कर सकते हो? हम पंडितों के खिलाफ कभी नहीं थे और अगर छोड़कर भागी पीढ़ी से पूछोगे तो बता देंगे कि समस्या तो बंदूक के डर से हमारी और परिवारों के जान की थी, कश्मीरियों से कभी नहीं थी।
मेरे दोस्त के पास सॉल्यूशन नहीं था क्योंकि शायद वो मुझसे थोड़ा सा डर भी रहा था, दिल्ली में जो बैठा था। फिर भी मुझे उससे बात करके इतना तो पता चल गया था कि कश्मीरी अब अपना इतिहास नहीं बल्कि वर्तमान देख रहे हैं। इतिहास पर बात सिर्फ सरकारें और उनके दलाल कर रहे हैं।
आज हम उस पीढ़ी से लोकतांत्रिक व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते जिसने 90 के दशक में बंदूकों के साये में अपना बचपन गुज़ारा है और अब वो जवान है। लेकिन हमारी सरकारें बात कर सकती हैं। हालिया उठापटक में मुझे भी ख्याल आया कि सरकार सिर्फ कर्फ्यू से कैसे निपट सकती है जबकि सामने वाला तुम्हारे कानून को मानता ही नहीं है? लेकिन एक तरीका नागरिक समितियों का भी है। जब भी नागरिकों से बात करने की बात आती है तो कथित राष्ट्रवादी उसे रायशुमारी का नाम दे देते हैं। शायद ये उससे अलग है और पूरी की पूरी पीढ़ी को चौराहों पर चर्चा करने के लिये बुला सकती है। तब, तब शायद बंदूकों के साये में जवान हुए लोग लोकतंत्र को समझ पायें लेकिन हमें अपने आप से पूछना चाहिये कि क्या हमारी सरकारों का अपने नागरिकों के प्रति लोकतांत्रिक व्यवहार है?
(मैंने साल 2009 में अपने एक कश्मीरी दोस्त से बात की थी, अब पता नहीं वो कहां है क्योंकि मेरी उससे बात नहीं हो पाती लेकिन शायद बेहतरी की उम्मीद में तब वो भी था...। क्या हमारी सरकारें हैं???)

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

पत्रकारिता के कोर्सः ज़रूरत और मायने

पत्रकारिता की पहली कक्षा में न्यूज़ राइटिंग सिखाते हैं मतलब 5W1H (What, Where, Why, When, Whom and How) . फिर जब अगले दर्जे में पहुंचते हैं तब Objectivity, Media ethics, Media law जैसे भारी भरकम टर्म से आपका सामना पड़ता है। फिर अचानक एक गेस्ट फैकल्टी आकर आपको बताते हैं कि पत्रकार कभी निष्पक्ष नहीं हो सकता। उसकी भी भावनाएं हैं, विचार हैं, राजनीतिक विचारधारा है... ब्ला ब्ला ब्ला...। फिर अखबारों और चैनलों को संचालित करने वाले कॉर्पोरेट्स हैं। पत्रकार नौकर हैं और कॉर्पोरेट्स मालिक। कॉर्पोरेट्स की भी अपनी राजनीतिक विचारधारा है। उसके हिसाब से चलो तो नौकरी है... न चलो तो लात मारकर बाहर फैंके जाओगे।
पत्रकारिता में एक नयी विधा है जिसे Advertising and Public Relation  के नाम से जाना जाता है। हिन्दी में इसका मतलब है कि पैसा और विज्ञापन पाने के लिये किसी भी व्यक्ति या संस्था से Objectivity का समझौता करना। ये विधा पूर्णरूपेण पूंजीवाद की पैदाइश है। और फिर ऐसी विधा को पढ़कर आये विद्यार्थी से आप निष्पक्षता की उम्मीद करते हैं।
एक ऐसा बेचारा जिसे पूरी तरह भारत के इतिहास, भूगोल, संविधान व व्यवस्था, संस्कृति और दुनिया की कुछ भी जानकारी नहीं है, उसे कई लाख रुपये में एक डिग्री-डिप्लोमा थमाकर पत्रकार बना दिया जाता है। वो बेचारा बाजार में आता है और बाजारू का बन जाता है।
वैसे भी अब तो खुला खेल फर्ररुख़ाबादी है... मतलब चुनावों से लेकर बाजार में अपने प्रॉडक्ट को जमाने तक सब पत्रकारिता की इसी बदनाम विधा का इस्तेमाल करते हैं। करते तो हैं और फायदा भी कमाते हैं लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान कौन सहता है? नुकसान सहता है वो पत्रकार जिसे दल्ला, दलाल, चमचा और पता नहीं किन किन गंदे नामों से नवाज़ा जाता है।
बरखा दत्त राडिया टेप में दागी है तो सुधीर चौधरी भी उमा खुराना के फर्जी स्टिंग से लेकर जिंदल से दलाली मांगने तक में दागी है। लेकिन जनता अपने हिसाब से सबको देशभक्त या देशद्रोही की कैटेगरी में रख लेती है।
ये तो बहुत बड़े नाम हैं जो दो जून की रोटी के लिये नौकरी न भी करें तो भूखे नहीं मरेंगे लेकिन न्यूज़ रूम में 8 से 10 घंटे खटते उस पत्रकार को कोई नहीं जानता जो अखबारों और चैनलों के पैकेज बनाता है। ख़ैर, इसके लिये भी ख़ुद पत्रकार ही ज़िम्मेदार हैं जो उन्होंने अपने आपको गुलाम बनाने के लिये किसी को इतना अधिकार दिया हुआ है।
मेरा पहले भी मानना था और आज भी मानना है कि वास्तव में कोई भी व्यक्ति पत्रकार स्वभावतः होता है। उसे किसी Journalism and Mass Communication टाइप के कोर्स करने की ज़रूरत नहीं होती। मैंने ये डिग्री ली है और मुझे नहीं लगता कि इस पत्रकारिता के कोर्स को करने के बाद मैं एक बेहतर पत्रकार बन पाया हूं।

     

गुरुवार, 30 जून 2016

उत्तर प्रदेश में सत्ता का गणित

लोगों ने राज्य स्तर पर सत्ता के विकेन्द्रीकरण को समझा है और उसी का नतीजा है कि क्षेत्रीय पार्टियों का उभार हुआ। सही मायने में भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां स्थानीय प्रतिनिधित्व और जनता की उम्मीदों पर उस तरह से खरी नहीं उतरी होंगी तभी तो जनता ने अपना रुख़ अलग किया है। ऐसा निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा ने यूपी के लोगों की आवाज़ सुनने में असफल रहीं जो कि इन्हें राज्य में कमज़ोर बनाने के लिये मुख्य कारण है।

भारत की चुनावी राजनीति में साल 2017 बेहद अहम होने जा रहा है क्योंकि राजनीतिक तौर पर देश के सबसे महत्वपूर्ण सूबे उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से सही मायने में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों की मजबूती का पता चलेगा। सभी पार्टियों ने चुनाव की तैयारियां लगभग शुरू कर दी हैं। हालांकि सुदृढ़ होते हुए भी इस चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की चर्चा नहीं हैं। चर्चा का मुख्य बिंदु भाजपा और कांग्रेस हैं। भाजपा इसलिये है क्योंकि बिहार का चुनाव हारने के बाद पार्टी की अच्छी खासी फज़ीहत हो चुकी है और राष्ट्रीय अध्यक्ष की इज्जत दांव पर है। कांग्रेस चर्चा में इसलिये है क्योंकि कांग्रेस ने जिसे चुनावी अर्जुन चुना है वो केन्द्र में नरेन्द्र मोदी और बिहार में नीतीश कुमार को सत्ता दिला चुका है... मतलब प्रशांत किशोर उर्फ पीके।
निश्चित तौर पर कांग्रेस के रणनीतिकार होने के नाते पीके खुद भी यूपी में सत्ता की चाभी ढूंढ ही रहे होंगे लेकिन अहम सवाल तो ये है कि कैसे लगभग 28-30 साल यूपी में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस की स्थिति इतनी खराब हुई? या भाजपा इतने विश्वास में कैसे है कि यूपी में सत्ता पा लेगी। खैर, ये अलग बात है कि भाजपा तो बिहार में भी बहुत अतिविश्वास में थी। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि कांग्रेस का वोट कहां गया? क्षेत्रीय पार्टियां कैसे उभरीं और सत्ता में आयीं? भाजपा कहां है और कहां से वोट बटोर रही है क्योंकि यूपी में लोकसभा चुनावों में तो भाजपा ने ही बाकी सबका सूपड़ा साफ कर दिया है।
जहां तक क्षेत्रीय पार्टियों का प्रश्न है तो ये एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसमें एक समय के बाद क्षेत्रीय जनता सत्ता में अपनी हिस्सेदारी मांगती है। 73वें और 74वें संविधान संशोधन ने सत्ता के विकेन्द्रीकरण की इबारत लिखी है। लोगों ने राज्य स्तर पर सत्ता के विकेन्द्रीकरण को समझा है और उसी का नतीजा है कि क्षेत्रीय पार्टियों का उभार हुआ। सही मायने में भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां स्थानीय प्रतिनिधित्व और जनता की उम्मीदों पर उस तरह से खरी नहीं उतरी होंगी तभी तो जनता ने अपना रुख़ अलग किया है। ऐसा निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा ने यूपी के लोगों की आवाज़ सुनने में असफल रहीं जो कि इन्हें राज्य में कमज़ोर बनाने के लिये मुख्य कारण है। हालांकि राजनीति के दौर बदलते हैं और वर्तमान समय में नरेन्द्र मोदी मिनिमम गवर्मेंट-मैक्सिमम गवर्नेंस का जुमला देकर भी राजनीतिक केन्द्रीयकरण की राजनीति को पोषित करने वाले चेहरे के रूप में उभरे हैं। मोदी और अमित शाह अपने आप में भाजपा में केन्द्रीयकरण को पोषित करते दिखाई देते हैं। आज राज्य भाजपा इकाइयों की, उनके नेताओं की राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के सामने कुछ भी अहमियत नहीं है।
ये अलग बात है कि क्षत्रपों में ऐसी राजनीति काम नहीं आती। अगर आ सकती तो शायद भाजपा और कांग्रेस दोनों की स्थिति यूपी में इतनी खराब नहीं होती। तो बात वहीं आकर टिकती है कि पीके और अमित शाह दोनों ही केन्द्रीयकरण के समर्थक हैं? क्या क्षेत्रीय उम्मीदों को महंगाई और भ्रष्टाचार के जुमलों और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के नाम पर कुचलने की परंपरा विकसित करनी है? आखिर कैसे आप क्षेत्रीय पार्टियों के भ्रष्टाचार को मुद्दा बना सकते हैं जबकि आपके सामने व्यापमं जैसे उदाहरण हों? और दो साल में कई गुना महंगाई बढाने वाली मोदी सरकार उसके ऊपर चुप्पी साधे बैठी है। छोटे राज्यों का समर्थन करने वाली भाजपा के लिये यूपी जैसे बड़े राज्य में ये मुख्य चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनता कि राज्य तोड़ना वाजिब और सही कदम हो सकता है जबकि समूचा बुंदेलखंड पिछले कई सालों से बदहाल है?
सवाल कई हैं लेकिन यूपी में सत्ता का गणित क्या है, इसे समझना महत्वपूर्ण है। यूपी में जब कांग्रेस की सत्ता थी तब कांग्रेस को मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण वोट पूरी तरह से मिलते थे। उस समय पिछड़ा वोट पूरा जनता दल को जाता था और भाजपा या जनसंघ जैसों का कहीं अस्तित्व ही नहीं था। सत्ता के विकेन्द्रीकरण और बाबरी जैसे मुद्दों ने तथा कालान्तर में जनता दल के बिखरने ने भाजपा को एक मजबूत आधार दिया है। लेकिन क्या अब वो फॉर्मूला काम कर सकता है? शायद नहीं, और इसीलिये भाजपा अब यूपी में दलित और पिछड़ा कार्ड खेलने से पीछे नहीं हट रही है।
जहां तक वोटों का गणित है उसे ऐसे समझिये कि यूपी में लगभग 20 प्रतिशत मुस्लिम, 12 प्रतिशत दलित और 10 प्रतिशत ब्राह्मण हैं बाकी सब में अन्य जातियां आ जाती हैं। जब तक कांग्रेस को ये 42 प्रतिशत वोट मिलते रहे उनकी सत्ता रही। अब माइनस कीजिये दलितों का वोट जो बसपा को मिलता है और उसमें जोड़िये ब्राह्मणों का वोट साथ में कुछ मुस्लिम वोट तो पूर्ण बहुमत में बनी थी पिछली बसपा की सरकार। उस सरकार में एंटी इनकम्बेंसी जोड़िये, मुस्लिम वोट और पिछड़ों के वोट जोड़िये बनती है सपा की वर्तमान सरकार। अब 2017 को देखिये....
ऐसा माना जाता है कि बसपा का दलित वोट बैंक उसके साथ है और मुज्ज़फरनगर, दादरी और कैराना जैसे मसलों के उभरने के बाद मुस्लिमों का रुझान सपा से बसपा की ओर हो सकता है। लेकिन केवल इतने वोट से यूपी में सत्ता पाना संभव नहीं है। सपा इस समय अपना मुस्लिम और पिछड़ा वोट बचाने की भरसक कोशिश कर रही है। भाजपा के पास अपना अगड़ी जातियों का वोट तो है लेकिन ब्राह्मण वोट किस तरफ जायेगा अभी कहना मुश्किल लग रहा है। तो यूपी में सारा गणित अब पिछड़े वोट का है जो संख्या में सबसे बड़ा है। इस वोट पर सभी पार्टियों की नज़र है। जहां लगभग पूरा यादव वोट सपा के खाते में रहता है, वहीं पिछले लोकसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट वोट राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया अजीत सिंह के हाथ से फिसल कर भाजपा की ओर जा चुका है। कुर्मियों के वोट पर नीतीश कुमार की जद (यू) नज़र गढ़ाए बैठी है जबकि लोधी वोट बैंक कल्याण सिंह के सहारे भाजपा फिर से पाने की जुगाड़ में है। इसके अलावा कश्यप, त्यागी तथा अन्य पिछड़ी जातियों का भी यूपी की कई विधानसभा सीटों पर अच्छा खासा दबदबा है। इन पिछड़े वोट को साधने के लिये ही भाजपा ने अपनी यूपी की कमान पिछड़ों के हाथ में देने का फैसला किया है।
लेकिन पिछले काफी सारे रुझान बताते हैं कि राज्य और केन्द्र के चुनाव में जनता अलग-अलग तरीके से अपनी पसंद जाहिर करती है। बिहार और दिल्ली इसके हालिया उदाहरण हैं जहां जनता ने केन्द्र के लिये तो भाजपा को जमकर वोट किया लेकिन विधानसभा चुनावों में जनता की पहली पसंद भाजपा नहीं रही। तो इस चुनावी बिसात में कांग्रेस कहां है?
पीके ने निश्चित तौर पर ये गणित लगा लिया होगा कि यूपी में भाजपा कमजोर नहीं तो बहुत मजबूत स्थिति में भी नहीं है। मान लीजिये कि कांग्रेस किसी भी तरह ब्राह्मण और मुस्लिमों को भरोसे में ले लेती है तो यूपी विधान सभा निश्चिततौर पर त्रिशंकु हो जायेगी। जहां भाजपा और बसपा के गठबंधन की उम्मीद कम ही है तो कांग्रेस सरकार भले न बना सके लेकिन सत्ता का गणित तो बिगाड़ ही देगी। इसके लिये यूपी में कभी तो किसी ब्राह्मण चेहरे जैसे शीला दीक्षित को आगे करने की बात कही जाती है तो कभी विकल्प और लोकप्रिय नेता के तौर पर प्रियंका गांधी की मांग की जाती है। हाल-फिलहाल कांग्रेस के नेता भी कम से कम यूपी में सत्ता का सपना तो नहीं देख रहे होंगे लेकिन सरकार के गठबंधन में शामिल होना भी उनके लिये बहुत राहत की बात होगी।
तो इस चुनाव में सबसे हारा हुआ नेता कौन है? जी हां, किसी समय किसानों और पिछड़ों के सबसे बड़े नेता चौधरी चरण सिंह के वारिस अजीत सिंह। अजीत सिंह चाहते तो फिर से प्रदेश के बंटवारे का नारा बुलंद करके अपना वोट बचा सकते थे जिसमें बसपा का उन्हें साथ मिलता। वैसे भी बसपा की पिछली सरकार ने प्रदेश के विभाजन पर मुहर लगा ही दी थी। प्रदेश विभाजन पर कांग्रेस और भाजपा विरोध नहीं करती हैं जबकि सपा हमेशा से उत्तर प्रदेश के बंटवारे का विरोध करती रही है। इससे जहां पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में सपा को नुकसान होता वहीं दूसरी ओर भाजपा के ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला बने पश्चिमी इलाके में सांप्रदायिक मुद्दा कमजोर हो जाता। लेकिन अभी जैसे कयास लगाये जा रहे हैं उससे लगता है कि अजीत सिंह कभी भाजपा तो कभी सपा की ओर देख रहे हैं। वास्तव में अजीत सिंह मौके पर चौका मारने की राजनीति करने के लिये मशहूर रहे हैं। लेकिन अभी तो वे केवल गफलत में दिखाई दे रहे हैं।
कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं है। यूपी के आगामी चुनाव सभी पार्टियों के नेताओं की दिलों की धड़कन बढ़ाने के लिये काफी हैं। क्योंकि एक छोटे-मोटे देश के बराबर क्षेत्रफल और अच्छी खासी जनसंख्या वाले संसाधनों से भरपूर प्रदेश में आखिर कौन सत्ता नहीं पाना चाहेगा। देखते हैं ऊंट किस करवट बैठता है।     


मंगलवार, 14 मई 2013

टारगेट आईएएस फैक्ट्री – नाली में पड़े अधिकारी


ये बात मैं यहां तो लिख सकता हूं लेकिन किसी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवा से नहीं कह सकता क्योंकि मुझे पता है कि मुझे जवाब में काफी कुछ सुनने को मिल सकता है। फिर भी स्थितियों को देखकर दुख तो होता ही है जबकि देश का एक होनहार कीड़े वाले डिब्बे का खाना खाता है और पेशाबघर के बगल में बने खोखे से चाय खरीद कर पीता है

मुझे अभी भी याद है कि जब अपने शहर की एक शादी में गया था तो सब कुछ सामान्य था लेकिन यकायक एक पुलिस वैन और एक बत्ती वाली गाड़ी के आते ही उस शादी में बारात का स्वागत रुक चुका था। हां, ये सही है कि उस समय बाराती खुद को ठगा सा महसूस कर रहे थे लेकिन 100 रुपये के लिफाफे में घर के पांच सदस्यों को दावत में लाने वाले मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया अपने बच्चों को बता रहे थे कि देखो, ये हमारे शहर के कलैक्टर साहब हैं। देखा बत्ती का क्या रौब होता है।
दरअसल वो लोग अपने बच्चों की आखों में अपने आकांक्षारूपी सपनों को पालने का प्रयास कर रहे थे। कहानी गलत नहीं है, ऐसा होता भी है लेकिन ये बात अलग है कि बच्चे ये नहीं जानते कि अखंड प्रताप सिंह, आईएएस और आईएएस खेमका में क्या अन्तर है। फिर भी, अगर मुद्दे की बात की जाए तो बच्चों और युवाओं का सपने देखना तो किसी मायने में गलत नहीं है चाहे वो जो भी सोचकर देखे गए हों। और एक सच ये भी है कि इन सपनों की खातिर अपनी हड्डियां तक गलानी पड़ जातीं हैं। सपना कुछ और नहीं हैं, सपना है देश की सर्वश्रेष्ठ प्रशासनिक सेवाओं में जाने का। कुछ ऐसे ही सपने पाले लाखों युवा मुझे घेरे हुए हैं। कभी मैं भी उनमें से एक था लेकिन अन्तर्मन के विद्रोह और प्रतियोगिता के प्रति डर (कुछ लोगों के मुताबिक) ने मुझे इस समुदाय से अलग कर दिया। लेकिन क्या वास्तव में, मैं इस समुदाय या माहौल से अलग हो पाया हूं। ये सवाल आज भी मैं अपने आप से पूछ ही लेता हूं क्योंकि आज भी मैं वहीं पर रहता हूं बस बेरोजगार नहीं उससे बस कुछ अधिक या कहें कमतर बनकर।
लिखने और बताने को तो काफी कुछ है लेकिन ये भी सच है चाहे कचरा हो या हीरा, दोनों को निकालने के लिए गढ्ढे में उतरना ही पड़ता है। क्या आप लोगों ने कभी ऐसा देखा है कि 20 रुपये के मूल्य की थाली के 50 रुपये देकर एक चश्मा लगाए लड़के का पेट नहीं भरता और वो पानी पीकर पेट भर लेता है। आपके सामने ऐसा हो तो कहोगे कि हम ही उसे खाना खिला देते लेकिन ये भी सच है कि उस लड़के के चेहरे के खुद्दारी और ईमानदारी के भाव जरूर आप को डरा देंगे। मैंने ऐसा होते हुए देखा है, कभी-कभी सोचता हूं कि अगर एनडीटीवी वालों ने रवीश की रिपोर्ट को बंद न किया होता तो रवीश किसी न किसी दिन इस फैक्ट्री में भी आ ही जाते। जी हां, इस फैक्ट्री से आईएएस निकलते हैं और देश या कहें दिल्ली में इसका एक ही पता है...मुखर्जी नगर और आस-पास का इलाका। कभी आकर भी देखिए, बत्रा सिनेमा हॉल के चारों तरफ भीड़ का नजारा ही अलग होता है। आंखे ऊपर उठाएंगे तो कोचिंग सेंटर के विज्ञापन करते रंग बिरंगे बोर्ड देखकर सिर चकरा जाएगा। जब थोड़ा सा शान्त होंगे तो चारों तरफ अमीर-गरीब, चश्मे वाले-बिना चश्मे वाले और चाय पीते या किताब खरीदते लड़के-लड़कियों को देखकर आपको अच्छा लगने लगता है। लेकिन अगर इनकी लाइफस्टाइल आपने ले ली तो ये निश्चित है कि या तो आप घर के पलंग पर लेटे मिलेंगे या अस्पताल के। देखने, कहने और सुनने में काफी अच्छा लगता है कि बेटा या बेटी आईएएस के लिए तैयारी कर रहे हैं लेकिन जब पास आकर देखेंगे तो पता चलेगा कि किस प्रकार यहां एक दूसरे तरीके का लूट तंत्र विकसित किया गया है। चाहे कोचिंग वाले हों या मकान मालिक, दुकानदार हों या फेरी वाले सभी इस आंधी में आम बटोर लेना चाहते हैं।   
मुझे अभी भी याद है जब साल 2007 में, मैं इंजीनियरिंग और पत्रकारिता का बेहतर कैरियर छोड़कर आईएएस करने आया था। मुझे एक बेहतरीन कमरा तीन हजार रुपये में मिला था। तब मुखर्जी नगर के आस-पास के इलाकों में 1500 रुपये में कमरा मिल जाया करता था। लेकिन मुखर्जी नगर और बत्रा सिनेमा से दूर कौन जाए, यही सोच कर उस समय भी मेरी इमारत में हर मंजिल पर बनी रसोइयों (किचेन) में 1500 रुपयों में लड़के रहा करते थे। मुझे आज भी याद है कि जब एक दिन हिसाब लगाया तो पाया कि हमारे बाप की क्लास वन नौकरी से कहीं ज्यादा तो ये जाहिल कमा रहे हैं जो कि इतनी तमीज भी नहीं रखते थे कि जो उनके घर का राशन चला रहा है उससे तमीज से पेश आएं। आज के हालात कुछ अलग हैं। जो कमरा मैंने 2007 में 3000 रुपये का लिया था वो आज 9000 हजार रुपये का मिलता है। रही बात रसोई की तो भी आप को 3500 या 4000 रुपये में मिल ही जाएगी। किराये के साथ मुखर्जी नगर के मकान मालिकों के पहनने, खाने-पीने के स्तर में भी सुधार आया है। आज साल 2007 के मुकाबले मुखर्जी नगर और आसपास के इलाके में दस गुना ज्यादा लम्बी गाड़ियां मकान मालिकों के पास देखने को मिल जाएंगी। ये सही है कि आज की तारीख में भी मुखर्जी नगर के लोग किराये पर जी रहे हैं। बहुत कम लोग ही ऐसे हैं जो या तो नौकरी कर रहे हैं या उनका अपना बिजनेस हो। रात ढलते ही बत्रा सिनेमा के सामने वाले दारू के ठेके गुलजार हो जाते हैं और पूरे दिन सोकर उठे, घर बैठे बने रईसजादे काले शीशों वाली गाड़ियों में दारू पीने और मुर्गा खाने के मिशन पर निकल पड़ते हैं। बड़ा ही आनन्ददायक माहौल होता है जब इनके शीशों को फोड़ते हुए हनी सिंह के अश्लील गाने सुनाई पड़ते हैं।
ये तो तस्वीर का एक पहलू है जनाब। हमारे मुखर्जी नगर में दो मिस्टर सिंह भी है। पहले जो हैं वो लोक प्रशासन पढ़ाते हैं और कहते हैं कि जहां किताबें खत्म होती हैं वहां से मैं पढ़ना शुरू करता हूं। ऐसा लगता है जैसे साक्षात् राजकुमार की किसी फिल्म के डायलॉग चल रहे हों। दूसरे मिस्टर सिंह का दावा है कि इतिहास में जितने सलेक्शन इनके यहां से हुए हैं उतने किसी के यहां से नहीं होते। दावे दोनों ही बहुत बड़े-बड़े करते हैं लेकिन यकीन मानिये कि इनके यहां हमारे साथ पढ़े बेहद होशियार मित्रों में किसी का भी सलेक्शन नहीं हुआ। यहां पर भी मान लें तो ठीक, मैं तो कहता हूं कि इनके यहां पढ़े बेचारे विषय के आधारभूत ज्ञान से भी वंचित हो गए। दरअलस, भीड़ देखकर यहां भी हर एक असफल व्यक्ति कोचिंग खोल कर बैठ गया है। लेकिन सोचने वाली बात है कि जब ये कोचिंग वाले महान ज्ञानी कभी आईएएस की प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर पाये तो ये कैसे किसी को बल्कि अखबार में छपे चेहरों को आईएएस बना देने का दम भरते हैं। कह सकते हैं कि ज्ञान और ज्ञानी पर मेरी नकारात्मक सोच है लेकिन व्यग्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि आंधी के आम हैं जो बटोरे जा रहे हैं। हाहाहाहाहा.........
यहां अय्याशी करने वाले तथाकथित आईएएस की तैयारी करने वाले लड़कों की भी कमी नहीं है लेकिन उनका क्या जो बेचारे अपना सब-कुछ दांव पर लगाए तैयारी कर रहे हैं। यहां हरियाणा, राजस्थान, बिहार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमीर और नेतागीरी वाले घरानों के भी लड़के आते हैं जो गरीब लड़कों को अपने पैसे की घटिया और झूठी चकाचौंध दिखाते रहते हैं। लेकिन वास्तविकता ये है कि इन रईसजादों के भाग्य में बेहतर भोजन ही होता है जबकि पद और प्रतिष्ठा तो कीड़े वाले खाने के डिब्बे को खाने वाले लड़के की किस्मत में ही होती है।
फिर भी, मैं अभी भी कहता हूं कि सपने देखना बुरा नहीं होता है बल्कि बुरा तो उसे समाज बनाता है। यहां प्रॉपर्टी डीलरों का मकड़जाल फैला हुआ है। कौन हैं ये लोग? सोचा जा सकता है लेकिन सही मायने में ये लोग यहीं के रहने वाले हैं और एक दूसरे के मकानों को किराये पर चढ़ाने का कमीशन वसूल करते हैं। यही नहीं, चूंकि ये महीने के किराये पर कमीशन लेते हैं इसीलिये हर दो से छह महीने में कमरों का किराया भी बढ़ जाता है। अगर आपको कमरा लेना है तो शाम को अपनी दुकान पर या दारू के ठेके के आसपास ये आपको झूमते और एक-दूसरे को गरियाते मिल ही जाएंगे।
मैं आपको ये नहीं जताना चाहता कि मैं किसी छात्र यूनियन का झंडाबरदार हूं। वास्तविकता का एक और पहलू भी है। ऐसी मजबूर कर देने वाली परिस्थितियों में भी सफल होने वाले छात्रों के बीच एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे देखकर केवल निराशा ही हाथ लगती है। वास्तव में लोगों के पास आईएएस बनने का लक्ष्य तो है लेकिन कोई उद्देश्य नहीं है। इससे भी ज्यादा निराशा आपको तब होगी जबकि किसी बड़े अधिकारी का बेटा या भाई न केवल बताता है बल्कि इस बात पर गर्व करता है कि वो जिस पैसे से अय्याशी कर रहा है वो भ्रष्टाचार से कमाया हुआ है।
लेकिन इन सारी बातों को छोड़कर भी नीतिगत मुद्दों पर बात की जा सकती है। यहां पढ़ने वाले 99.99% युवा जानते हैं कि सरकारी नीतियां गलत हैं लेकिन उनको वही पढ़ना होता है जिसे पढ़ कर वे सरकारी सेवा की परीक्षा पास कर सकें। दरअसल ये तैयारी करने वाले युवाओं की नहीं बल्कि सरकार की नीति है कि गलत को भी सही कहो और जैसा चल रहा है वैसा चलने दो क्योंकि उन्हें सरकारी सेवाओं में जाना है। इस सब स्थितियों को देखकर ये एहसास होता है कि हम गलत तरीके से केवल गलत लोगों को ही तैयार कर रहे हैं।
ये बात मैं यहां तो लिख सकता हूं लेकिन किसी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवा से नहीं कह सकता क्योंकि मुझे पता है कि मुझे जवाब में काफी कुछ सुनने को मिल सकता है। फिर भी स्थितियों को देखकर दुख तो होता ही है जबकि देश का एक होनहार कीड़े वाले डिब्बे का खाना खाता है और पेशाबघर के बगल में बने खोखे से चाय खरीद कर पीता है।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं।

रविवार, 24 मार्च 2013

मैं नहीं बदलूंगा

क्या चिल्लाकर ये साबित कर दोगे कि तुम सही हो? क्या दूसरे की बात सुने बगैर तुम कह सकते हो कि तुम ही सही हो? क्या अपने हिसाब से तुम किसी के विचार बिना पूछे ही घोषित कर सकते हो?

कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति तुम्हारे साथ नहीं खड़ा होगा। क्योंकि अपने मुताबिक बात मनाने के लिए तुम मेरी स्वतंत्रता का हनन कर रहे हो। मैं पहले भी सही था कि केवल अच्छी जगह पढ़ लिख जाने से न तो तुम्हारा मानसिक विकास हो सकता है और न ही तुम्हारी मानसिकता बदल सकती है। तुम कितना भी ये सोचो कि मैं तुम्हारी भाषा में ही तुमसे बात करूंगा तो ये तुम्हारी गलती है। मैं जैसा हूं वैसा ही रहूंगा और तुम्हारे कहने से तुम्हारी भाषा तो कतई नहीं बोलूंगा।

और चिल्लाओ, कितना चिल्लाओगे? अब मैं नहीं, मेरी कलम ही बोलेगी। इसके बाद ये समझने की भूल भी मत करना कि मैं कमजोर हूं वरना तुम बहुत पछताओगे। तुम ये घोषित नहीं कर सकते कि मुझे धार्मिक (नास्तिक नहीं) होना चाहिए। तुम ये घोषित नहीं कर सकते कि केवल तुम्हारे ही राजनीतिक और सामाजिक विचार सही हैं। तुम नहीं घोषित कर सकते कि मेरे विचार गलत हैं जब तक कि तुम उन्हें जानो ही नहीं। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि न केवल मैं अपनी बल्कि तुम्हारी भी विचारों के प्रति स्वतंत्रता का सम्मान करता हूं।

तुम्हारे कहने से मैं किसी जनसंहारक नेता का समर्थन कभी नहीं करूंगा। एक इंसान होने के नाते, मैं आदमी की जान की कीमत समझता हूं। तुम ये कभी इसलिए नहीं समझ सकते क्योंकि तुम एक ऐसे धर्मांध व्यक्ति हो जो केवल धर्म और विचारधारा के आधार पर ही किसी को आदमी न समझे। ये तुम्हारा घमंड ही है जो तुम ये समझते हो कि सारी दुनिया की जानकारी केवल तुम्हारे पास है। अगर मैं सब कुछ नहीं जानता तो इतना भी जान लो कि मैं वो सब कुछ भी जानता हूं जोकि शायद तुम नहीं जानते। तुम तर्कों की बात मुझसे करते हो लेकिन खुद ही अपने तर्कों को मजबूत करने के लिए कोई ठोस सबूत ही नहीं रख सकते। खोखलापन केवल तुम्हारे विचारों से ही नहीं बल्कि तुम्हारे तर्कों से भी झलकता है। तुम कमजोर थे और हो इसीलिए तुम चिल्ला रहे हो। मुझे तुमसे डर नहीं लगता। तुम फिर से और कोशिश कर सकते हो लेकिन मैं फिर भी किसी धर्मांध विचारधारा, नेता या वैमनस्य की भावना का समर्थन नहीं करूंगा। ये जान लो कि मैं नहीं बदलूंगा।
विचार हमेशा से सहर्ष आमंत्रित हैं।  

बुधवार, 6 मार्च 2013

लोकतांत्रिक गुंडावाद



गौर कीजिए, ये हमारे यहां की नवीन राजनीतिक लहर है लोकतांत्रिक गुंडावाद। जैसे जेपी और लोहिया का समाजवाद आया, मार्क्स और माओ का वामपंथ आया, केजरीवाल का आम आदमीवाद आया वैसे ही अखिलेश, मोदी, ठाकरे, शिवराज और न जाने कितने फलाने-ढिमाकों का लोकतांत्रिक गुंडावाद आया।
कह लीजिए कि फिर से पागल हो गया है... लेकिन जब तर्कों से साबित करूंगा तो फिर से कुतर्की कमेंट कर या ई-मेल कर अपने गुंडावादी नेताओं को सही साबित करने लगोगे। पुराना उदाहरण बाद में लूंगा कभी, अभी ताजा लेते हैं। यूपी में एक डीएसपी मारा गया है। कोई बता सकता है किसने मारा है? जिस इलाके में ये डीएसपी तैनात था, उस इलाके का सबसे बड़ा गुंडा कौन है? इस इलाके में आज से कुछ साल पहले किस के घर के तालाब से नर कंकाल मिले थे? हां, जव़ाब सबको पता है, लेकिन बोलेगा कोई नहीं। अब इन गुंडावादी ताकतों के साथ आ जाएं गुंडों की पार्टी के सीएम अखिलेश यादव के समर्थक। जानता हूं, कि मशहूर होता और आगरा में बैठ ये ब्लॉग लिख रहा होता तो अब तक मेरे घर पर गोलियां चल चुकी होतीं। क्योंकि जिसके पास भी आज दो नम्बर का रुपया है वो सफेद पैंट-कमीज पहन इसी लोकतांत्रिक गुंडावाद में शामिल होना चाहता है। लेकिन दिल्ली में ये चूहे मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि सोनिया मैडम के पास सीबीआई नाम की बिल्ली है।
क्या कोई युवा नेता अखिलेश से पूछ सकता है कि एक गिरे हुए और सामंतवादी व समाजवादी विरोधी रघुराज सिंह (माफ कीजिए लेकिन प्रताप है ही नहीं इस गुंडे में) की पैरवी इनकी ही पार्टी के लोग क्यों कर रहे हैं। कायदा तो कहता है कि मंत्री पद छोड़ने के बाद रघुराज प्रताप सिंह नाम के गुंडे की रात हवालात में कटनी चाहिए थी। लेकिन जब लोकतांत्रिक गुंडावाद होगा तो इसके जैसा गुंडा मीडिया के सामने कुतर्क देकर अपनी एसयूवी में निकल जाएगा और पीछे-पीछे वही सफेद पैंट-कमीज वाले दो नम्बरी और कॉलेजों में लड़कियों के छेड़ने वाले गुंडे पीछे भागते दिखाई देंगे।
देखिए, व्यवस्था में ऐसे लोगों को लोकप्रिय घटिया समर्थक भी मिल जाते हैं। संसद में एक लड़की के बलात्कार पर घड़ियाली आंसू बहाने वाली कलाकार अखिलेश यादव को पार्टी लाइन के तहत युवा मुख्यमंत्री कह उनकी बढ़ाई कर रही हैं। मैडम को बताओ कोई कि जो लड़की विधवा हुई है वो बेबस नहीं बल्कि प्रदेश के एक पुलिस अधिकारी की पत्नी थी। उसके लिए उनके मन में कोई क्षोभ नहीं है क्योंकि खिलाफत करने पर न तो ये अगली बार सांसद रहेंगी और न ही यूपी में इनके दो नम्बर के पैसे को लगाने की इजाजत मिलेगी। दूसरी ओर, दिल्ली में भी कांग्रेस के घड़ियाली आंसू देख लीजिए कि यूपी में अराजकता का माहौल है। क्या इसी मुद्दे पर यूपी सरकार और समाजवादी पार्टी को कोसने वाली कांग्रेसी नेता परणीत कौर बता सकती हैं कि फिर ऐसे गुंडों से समर्थन लेकर केंद्र में सरकार क्यों चलाई जा रही है। उत्तर नहीं मिलेगा क्योंकि न केवल सब चोर हैं बल्कि चोरी सोची समझी साजिश के तहत सारे मौसेरे भाई मिल कर कर रहे हैं।
ऐसी ही सरकार के गुंडों ने मध्य प्रदेश के मुरैना में आईपीएस अधिकारी नरेंद्र तोमर को और उज्जैन में दिनदहाड़े एक प्रोफेसर का कत्ल किया था। किसी दो नम्बरी का क्या बिगड़ा बता दीजिए??? गुजरात में कई हजार लोग मौत के घाट उतार दिए गए, किसी ने नहीं सोचा कि कोई तो आखिरकार दोषी होगा... पूंजीवादियों की गोदी में बैठ कर कुछ मानवता के अपराधी प्रधानमंत्री बनने का सपना भी पालने लगे हैं।
लेकिन वो कुछ गलत नहीं सोचते क्योंकि जब तक हमारे यहां के लोग इंसानों की जिंदगी और ईमानदारी से प्यार करना नहीं सीखेंगे तब तक सत्येंद्र दुबे, मंजूनाथ, नरेंद्र तोमर, जिया उल हक और न जाने कितने योद्धा मारे जाएंगे और हम भारत के सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य के लोगों के सहयोग से लोकतांत्रिक गुंडावाद जारी रहेगा।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं।    

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

देश की गरिमा को देश ने ही न समझा



सोचिए कि क्रिकेट वर्ल्ड कप खेलने वाले व्यक्ति के लिए न तो देश में कोई नौकरी हो न ही रेल में सफर करने के लिए सीट। ये मज़ाक नहीं है लेकिन सोचिए कि आप ट्रेन में सफर कर रहे हों और आपके पास युवराज सिंह, धोनी या सचिन बैठा हो जबकि आपके पास सोने के लिए सीट हो और उसके पास नहीं। अविश्वसनीय सा लगता है न? लेकिन ये सच है। जब मैं अपनी सीट पर आराम से लेटा हुआ था तब एक घुंघराले बालों वाली हष्ट-पुष्ट लड़की जो देखने से ही खिलाड़ी लग रही थी, एक फौजी के बक्से (टिन के बॉक्स) पर बैठी लखनऊ से दिल्ली तक का रात का सफर कर रही थी।
क्या आप गरिमा चौधरी को जानते हैं? हो सकता है जानते हों, ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उसे मैं नहीं जानता था। चलिए गूगल अंकल का सहारा ले लेते हैं। देखिए और फिर मैं इसी गरिमा के बारे में आपसे कुछ कहना चाहता हूं।
जिन्होंने देख लिया हो तो ठीक नहीं तो जिन्होंने नहीं देखा हो वो ये जान लें कि गरिमा चौधरी भारत की वो बेटी है जिसने ओलम्पिक खेलों में जूडो के लिए देश का प्रतिनिधित्व किया है।

वैसे, मैं खेलों के प्रति लगभग उदासीन रवैया रखने वाला इन्सान हूं लेकिन गरिमा की चमत्कारिक शख़्सियत ने मुझे न केवल परिस्थितियों पर सोचने को बल्कि लिखने को भी मजबूर कर दिया। फिर भी मैं ये नहीं चाहता कि आप उस ताकतवर लड़की के लिए करुणा के भाव लाएं क्योंकि वो एक लौहस्त्री है जो हर कठिनाई को कभी भी उठाकर पटखनी देने की ताकत रखती है। लम्बी-चौड़ी कद काठी की गरिमा चौधरी उत्तर प्रदेश के मेरठ के पास बुलंदशहर नामक जिले की रहने वाली हैं और एक पारम्परिक जाट परिवार से ताल्लुक रखती हैं। गरिमा जूडो की अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं और ब्लैक बेल्ट धारक हैं। गरिमा के बारे में कुछ ख़ास तथ्य भी हैं जैसे गरिमा ने साढ़े तेरह साल की उम्र में वरिष्ठ वर्ग से खेलना शुरू कर दिया था, पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच 14 साल की उम्र में खेला और ओलम्पिक और कॉमनवेल्थ खेलों में गरिमा ने जूडो में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। गरिमा भारत की महान मुक्केबाज मैरी कॉम और पहलवान सुशील कुमार की बहुत अच्छी दोस्त भी हैं।
मैं ये सारे तथ्य आपके सामने इसलिए रख पा रहा हूं कि गरिमा को मैंने भारतीय रेलवे में खड़े होकर सफर करते देखा है। दरअसल, मेरे बिहार से वापसी के सफर के दौरान गरिमा लखनऊ से रेलगाड़ी में सवार हुई थीं और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पटियाला स्थिति कैंप में ट्रेनिंग के लिए जा रही थीं। पहले मुझे लगा कि ये किसी कॉलेज की लड़कियां हैं जो इन्टरकॉलेज कम्पटीशन में भाग लेने को किसी दूसरे शहर जा रहीं हैं। साथ में बैठे भाई साहब के साथ बिहार की राजनीति से चर्चा शुरू हुई जो भ्रष्टाचार से होती हुई कलमाडी और खेलों तक जा पहुंची। मेरे आईपीएल के खिलाफ बोलने पर गरिमा भी बहस में शामिल हो गईं। दरअसल, गरिमा के भीतर एक लावा था जो क्रिकेट और खेलों में व्याप्त भाष्टाचार के नाम पर फूट पड़ा।
गरिमा ने ऐसी बहुत सी बाते कहीं जिन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता। गरिमा के दावों के मजबूत होने का भी एक ठोस कारण है, वो ये है कि गरिमा हमारे उन क्रिकेटरों जैसी नहीं हैं जो हाईस्कूल फेल हैं और टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हुए करोड़ों में खेल रहे हैं। गरिमा की उम्र अभी भी कम है और वो खेल के साथ पढ़ाई भी करती हैं। गरिमा ग्रेजुएट हैं और आगे भी पढ़ना चाहती हैं। गरिमा के साथ जूडो की एक और खूबसूरत खिलाड़ी से मेरी मुलाकात हुई। इनका नाम नयना बी. पॉल है और ये केरल की रहने वाली हैं। आत्मविश्वास से भरी नयना दिल्ली विश्वविद्यालय के जीसस एंड मैरी कॉलेज से ग्रेजुएट हैं। इन खिलाड़ियों ने जिस आत्मविश्वास के साथ मुझे भारत में खेलों के संचालन और राजनीति के बारे में बताया उसे सुनकर कोई भी कह सकता है कि किसी बेहतरीन अनपढ़ क्रिकेटर से ये लड़कियां कहीं आगे हैं। ये मुझे आधुनिक भारत में नारी शक्ति और सशक्तिकरण की साक्षात प्रतिमा नज़र आ रहीं थी।
व्यक्तिगत रूप से, मैं क्रिकेट तो क्या किसी भी खेल के खिलाफ नहीं हूं लेकिन गरिमा और नयना ने बताया कि किस तरह भारत की अंध क्रिकेट भक्त जनता और राजनीति के कारण उन्हें काबलियत होते हुए भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस बात को साबित करने के लिए दोनों जूडो खिलाड़ियों ने अपना नाम नहीं लिया बल्कि मैरी कॉम और अखिल कुमार का नाम लिया। उनकी दलीलें काफी हद तक ठीक थीं।
जब बात आगे बढ़ी तो मैंने गरिमा से काफी सारे सवाल पूछने शुरू कर दिए। गरिमा ने अपने बारे में काफी सारी ऐसी बातें भी बतायीं जिन्हें सुनकर आपको भी सरकारी नीतियों और नीति नियंताओं पर शर्म आ जाए। ख़ैर सारी बातें तो नहीं कह सकता लेकिन इतना तो आपको पता ही है कि भारत में जूडो की विराट कोहली.... नहीं (सॉरी गरिमा) भारत में जूडो की रफाल नडाल या मैसी या टाइगर वुड्स रेलवे में बिना किसी आरक्षण के खड़े-खड़े सफर करती हैं। शर्मनाक बात तो ये है कि उत्तर प्रदेश की रहने वाली गरिमा ने किसी समय यूपी की टीम से खेलना शुरू किया था लेकिन सरकार की लापरवाही और खिलाड़ियों के प्रति रवैये को देखते हुए गरिमा ने हरियाणा की टीम से खेलना शुरू कर दिया। हालांकि गरिमा का कहना है कि खाने और रहने की सरकार के तरफ से कोई कमी नहीं है लेकिन अगर कोई खिलाड़ी खेलने के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियां भी उठाना चाहता है तो उसके लिए खेलों में कोई मौका नहीं है।
मैंने गरिमा से ये भी जानना चाहा कि ओलम्पिक खेलों में खेलने के बाद क्या उन्हें सरकारी नौकरी मिली? इस पर गरिमा का कहना था कि वे कुछ ही दिन पहले हरियाणा पुलिस का इंटरव्यू देकर आयी हैं। मैंने गरिमा को मुबारकबाद दी और कहा कि अब तो शायद डीएसपी की वर्दी में ही गरिमा से मुलाकात होगी तो गरिमा ने उदास होकर बोला कि उन्हें इन्सपेक्टर की पोस्ट दी जा रही है। यहीं से देखिए कि क्रिकेट और अन्य खेलों में किस प्रकार खिलाड़ियों में विभेद किया जाता है। जहां एक तरफ अशिक्षित या नकल कर पास हुए क्रिकेटरों को डीएसपी या कोई ऊंची पोस्ट दी जाती है वहीं ओलम्पिक खेल चुकी ग्रेजुएट गरिमा को इन्सपेक्टर की पोस्ट से ही संतुष्टी करनी पड़ रही है।
मेरे लिए गरिमा नाम की लड़की एक और चीज़ के लिए महत्वपूर्ण है। गरिमा पारम्परिक जाट परिवार से ताल्लुक रखती हैं और उन्हें खेल में अपने परिवार का पूरा समर्थन हासिल है। गरिमा का कहना है कि जब तक वे खेलों में ज्यादा आगे नहीं बढ़ीं थीं तब उनके आस-पास के लोग उनके माता पिता का मजाक उड़ाते थे लेकिन माता पिता के विश्वास के कारण ही गरिमा आज इतनी ऊंचाइयों तक पहुंच पाई हैं। गरिमा के माता पिता उन लोगों के लिए और खुद ऑनर किलिंग और दकियानूसी विचारों के लिए मशहूर जाट समुदाय के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं जो बेटों के सामने बेटियों को कमतर समझते हैं।
गरिमा ने मुझे पत्रकार समझते हुए ये निवेदन किया कि मैं भी कभी खिलाड़ियों के ऊपर लिखूं और दुनियां को उनकी सच्चाई से रूबरू कराऊं। मैं गरिमा को कोई बड़ा वादा तो न कर सका लेकिन उनके उज्जवल भविष्य की कामना जरूर की। मेरे पत्रकार दोस्त संजय ने गरिमा की खेल भावना को नमन करते हुए अपनी सीट उन्हें दे दी और कुछ घंटों में हम दिल्ली पहुंच गए। गरिमा को मैंने नहीं जगाया क्योंकि मैं उसकी आंखों में पल रहे सपनों को नहीं तोड़ना चाहता लेकिन कई महीनों से चोट से जूझ रही गरिमा के लिए एक बेहतर भविष्य की कामना तो कर ही सकता हूं।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं।