सोमवार, 19 अप्रैल 2010

यहाँ विचारों की स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं.

हमारे पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर साहब को भारत आने से पहले इस बात को अच्छी तरह जान लेना था कि भारत न तो यूरोप है न ही अमरीका जो खुल के कभी भी जब चाहा ब्लॉग पर अपने विचार लोगों से बाँट लिए। भैये! ये तो भारत है जहां विचार अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता सिर्फ संविधान में ही विचरण करती है थरूर अभी भी यही सोच रहे होंगे कि अगर अपना इस्तीफ़ा भी ट्विट्टर पे दिया होता तो शायद ज्यादा ठीक रहता। आखिरकार कांग्रेस ने अपने इस तथाकथित बिगडेल बच्चे के कान उमेठ ही दिए।
और जिसका डर था वो भी हुआ , आखिरकार आई पी एल भारत कि राजनीती पर हावी हो ही गया। संसद में मुद्दों कि कमी हो गयी और हंगामा हुआ उसी आई पी एल की वजह से। अब मोदी साहब ! आप की बारी है तैयार हो जाइये क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ संविधान में ही है।

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

महंगा पड़ा मोदी को

इसे कहते हैं कुर्सी की ताकत। आपके विचार मोदी और थरूर के बारे में भिन्न हो सकते हैं लेकिन ये बात तो तय है की थरूर ने ये तो दुनिया को जता ही दिया कि जो आदमी सरकार में हो उससे पंगा मत लो। चलो भैया, मोदी के पास तो पैसा भी है, आम आदमी का क्या? आज भारत का हर आम आदमी ये समझ ले कि जो कुर्सी पर बैठा हो उससे कुछ मत बोलो वरना अंजाम बुरा होगा।

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

उसको भुला दिया

अब किसको दोष देगा ये भारतीय समाज? एक ज़माना बीत गया उस शख्सियत को हमारे बीच से गए जिसने समाज में समानता का सपना देखा था। जिसने दबे कुचले लोगों के लिए आवाज़ बुलंद की थी, जिसने एक पिछड़े हुए समाज को फिर से सपने दिखाए , उन्हें आशाओं के पंख दिए। सबने सोचा ये ही है वो मसीहा जो इस समाज को जातिवाद के दलदल से निकालेगा लेकिन भारतीय समाज के क्या कहने , उसको न केवल भुला दिया बल्कि गलत भी ठहरा दिया।
आज बाबा साहब अम्बेडकर केवल मूर्तियों में जिंदा हैं और उनका सपना अभी भारतीय राजनीती की गन्दी नालियों में आखिरी सांस लेता नज़र आ रहा है।
अब बताइये दोष किसका अंग्रेजों की 'फूट डालो राज करो ' की नीति का या 'हमारा' ???