रविवार, 24 मार्च 2013

मैं नहीं बदलूंगा

क्या चिल्लाकर ये साबित कर दोगे कि तुम सही हो? क्या दूसरे की बात सुने बगैर तुम कह सकते हो कि तुम ही सही हो? क्या अपने हिसाब से तुम किसी के विचार बिना पूछे ही घोषित कर सकते हो?

कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति तुम्हारे साथ नहीं खड़ा होगा। क्योंकि अपने मुताबिक बात मनाने के लिए तुम मेरी स्वतंत्रता का हनन कर रहे हो। मैं पहले भी सही था कि केवल अच्छी जगह पढ़ लिख जाने से न तो तुम्हारा मानसिक विकास हो सकता है और न ही तुम्हारी मानसिकता बदल सकती है। तुम कितना भी ये सोचो कि मैं तुम्हारी भाषा में ही तुमसे बात करूंगा तो ये तुम्हारी गलती है। मैं जैसा हूं वैसा ही रहूंगा और तुम्हारे कहने से तुम्हारी भाषा तो कतई नहीं बोलूंगा।

और चिल्लाओ, कितना चिल्लाओगे? अब मैं नहीं, मेरी कलम ही बोलेगी। इसके बाद ये समझने की भूल भी मत करना कि मैं कमजोर हूं वरना तुम बहुत पछताओगे। तुम ये घोषित नहीं कर सकते कि मुझे धार्मिक (नास्तिक नहीं) होना चाहिए। तुम ये घोषित नहीं कर सकते कि केवल तुम्हारे ही राजनीतिक और सामाजिक विचार सही हैं। तुम नहीं घोषित कर सकते कि मेरे विचार गलत हैं जब तक कि तुम उन्हें जानो ही नहीं। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि न केवल मैं अपनी बल्कि तुम्हारी भी विचारों के प्रति स्वतंत्रता का सम्मान करता हूं।

तुम्हारे कहने से मैं किसी जनसंहारक नेता का समर्थन कभी नहीं करूंगा। एक इंसान होने के नाते, मैं आदमी की जान की कीमत समझता हूं। तुम ये कभी इसलिए नहीं समझ सकते क्योंकि तुम एक ऐसे धर्मांध व्यक्ति हो जो केवल धर्म और विचारधारा के आधार पर ही किसी को आदमी न समझे। ये तुम्हारा घमंड ही है जो तुम ये समझते हो कि सारी दुनिया की जानकारी केवल तुम्हारे पास है। अगर मैं सब कुछ नहीं जानता तो इतना भी जान लो कि मैं वो सब कुछ भी जानता हूं जोकि शायद तुम नहीं जानते। तुम तर्कों की बात मुझसे करते हो लेकिन खुद ही अपने तर्कों को मजबूत करने के लिए कोई ठोस सबूत ही नहीं रख सकते। खोखलापन केवल तुम्हारे विचारों से ही नहीं बल्कि तुम्हारे तर्कों से भी झलकता है। तुम कमजोर थे और हो इसीलिए तुम चिल्ला रहे हो। मुझे तुमसे डर नहीं लगता। तुम फिर से और कोशिश कर सकते हो लेकिन मैं फिर भी किसी धर्मांध विचारधारा, नेता या वैमनस्य की भावना का समर्थन नहीं करूंगा। ये जान लो कि मैं नहीं बदलूंगा।
विचार हमेशा से सहर्ष आमंत्रित हैं।  

बुधवार, 6 मार्च 2013

लोकतांत्रिक गुंडावाद



गौर कीजिए, ये हमारे यहां की नवीन राजनीतिक लहर है लोकतांत्रिक गुंडावाद। जैसे जेपी और लोहिया का समाजवाद आया, मार्क्स और माओ का वामपंथ आया, केजरीवाल का आम आदमीवाद आया वैसे ही अखिलेश, मोदी, ठाकरे, शिवराज और न जाने कितने फलाने-ढिमाकों का लोकतांत्रिक गुंडावाद आया।
कह लीजिए कि फिर से पागल हो गया है... लेकिन जब तर्कों से साबित करूंगा तो फिर से कुतर्की कमेंट कर या ई-मेल कर अपने गुंडावादी नेताओं को सही साबित करने लगोगे। पुराना उदाहरण बाद में लूंगा कभी, अभी ताजा लेते हैं। यूपी में एक डीएसपी मारा गया है। कोई बता सकता है किसने मारा है? जिस इलाके में ये डीएसपी तैनात था, उस इलाके का सबसे बड़ा गुंडा कौन है? इस इलाके में आज से कुछ साल पहले किस के घर के तालाब से नर कंकाल मिले थे? हां, जव़ाब सबको पता है, लेकिन बोलेगा कोई नहीं। अब इन गुंडावादी ताकतों के साथ आ जाएं गुंडों की पार्टी के सीएम अखिलेश यादव के समर्थक। जानता हूं, कि मशहूर होता और आगरा में बैठ ये ब्लॉग लिख रहा होता तो अब तक मेरे घर पर गोलियां चल चुकी होतीं। क्योंकि जिसके पास भी आज दो नम्बर का रुपया है वो सफेद पैंट-कमीज पहन इसी लोकतांत्रिक गुंडावाद में शामिल होना चाहता है। लेकिन दिल्ली में ये चूहे मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते क्योंकि सोनिया मैडम के पास सीबीआई नाम की बिल्ली है।
क्या कोई युवा नेता अखिलेश से पूछ सकता है कि एक गिरे हुए और सामंतवादी व समाजवादी विरोधी रघुराज सिंह (माफ कीजिए लेकिन प्रताप है ही नहीं इस गुंडे में) की पैरवी इनकी ही पार्टी के लोग क्यों कर रहे हैं। कायदा तो कहता है कि मंत्री पद छोड़ने के बाद रघुराज प्रताप सिंह नाम के गुंडे की रात हवालात में कटनी चाहिए थी। लेकिन जब लोकतांत्रिक गुंडावाद होगा तो इसके जैसा गुंडा मीडिया के सामने कुतर्क देकर अपनी एसयूवी में निकल जाएगा और पीछे-पीछे वही सफेद पैंट-कमीज वाले दो नम्बरी और कॉलेजों में लड़कियों के छेड़ने वाले गुंडे पीछे भागते दिखाई देंगे।
देखिए, व्यवस्था में ऐसे लोगों को लोकप्रिय घटिया समर्थक भी मिल जाते हैं। संसद में एक लड़की के बलात्कार पर घड़ियाली आंसू बहाने वाली कलाकार अखिलेश यादव को पार्टी लाइन के तहत युवा मुख्यमंत्री कह उनकी बढ़ाई कर रही हैं। मैडम को बताओ कोई कि जो लड़की विधवा हुई है वो बेबस नहीं बल्कि प्रदेश के एक पुलिस अधिकारी की पत्नी थी। उसके लिए उनके मन में कोई क्षोभ नहीं है क्योंकि खिलाफत करने पर न तो ये अगली बार सांसद रहेंगी और न ही यूपी में इनके दो नम्बर के पैसे को लगाने की इजाजत मिलेगी। दूसरी ओर, दिल्ली में भी कांग्रेस के घड़ियाली आंसू देख लीजिए कि यूपी में अराजकता का माहौल है। क्या इसी मुद्दे पर यूपी सरकार और समाजवादी पार्टी को कोसने वाली कांग्रेसी नेता परणीत कौर बता सकती हैं कि फिर ऐसे गुंडों से समर्थन लेकर केंद्र में सरकार क्यों चलाई जा रही है। उत्तर नहीं मिलेगा क्योंकि न केवल सब चोर हैं बल्कि चोरी सोची समझी साजिश के तहत सारे मौसेरे भाई मिल कर कर रहे हैं।
ऐसी ही सरकार के गुंडों ने मध्य प्रदेश के मुरैना में आईपीएस अधिकारी नरेंद्र तोमर को और उज्जैन में दिनदहाड़े एक प्रोफेसर का कत्ल किया था। किसी दो नम्बरी का क्या बिगड़ा बता दीजिए??? गुजरात में कई हजार लोग मौत के घाट उतार दिए गए, किसी ने नहीं सोचा कि कोई तो आखिरकार दोषी होगा... पूंजीवादियों की गोदी में बैठ कर कुछ मानवता के अपराधी प्रधानमंत्री बनने का सपना भी पालने लगे हैं।
लेकिन वो कुछ गलत नहीं सोचते क्योंकि जब तक हमारे यहां के लोग इंसानों की जिंदगी और ईमानदारी से प्यार करना नहीं सीखेंगे तब तक सत्येंद्र दुबे, मंजूनाथ, नरेंद्र तोमर, जिया उल हक और न जाने कितने योद्धा मारे जाएंगे और हम भारत के सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य के लोगों के सहयोग से लोकतांत्रिक गुंडावाद जारी रहेगा।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं।    

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

देश की गरिमा को देश ने ही न समझा



सोचिए कि क्रिकेट वर्ल्ड कप खेलने वाले व्यक्ति के लिए न तो देश में कोई नौकरी हो न ही रेल में सफर करने के लिए सीट। ये मज़ाक नहीं है लेकिन सोचिए कि आप ट्रेन में सफर कर रहे हों और आपके पास युवराज सिंह, धोनी या सचिन बैठा हो जबकि आपके पास सोने के लिए सीट हो और उसके पास नहीं। अविश्वसनीय सा लगता है न? लेकिन ये सच है। जब मैं अपनी सीट पर आराम से लेटा हुआ था तब एक घुंघराले बालों वाली हष्ट-पुष्ट लड़की जो देखने से ही खिलाड़ी लग रही थी, एक फौजी के बक्से (टिन के बॉक्स) पर बैठी लखनऊ से दिल्ली तक का रात का सफर कर रही थी।
क्या आप गरिमा चौधरी को जानते हैं? हो सकता है जानते हों, ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उसे मैं नहीं जानता था। चलिए गूगल अंकल का सहारा ले लेते हैं। देखिए और फिर मैं इसी गरिमा के बारे में आपसे कुछ कहना चाहता हूं।
जिन्होंने देख लिया हो तो ठीक नहीं तो जिन्होंने नहीं देखा हो वो ये जान लें कि गरिमा चौधरी भारत की वो बेटी है जिसने ओलम्पिक खेलों में जूडो के लिए देश का प्रतिनिधित्व किया है।

वैसे, मैं खेलों के प्रति लगभग उदासीन रवैया रखने वाला इन्सान हूं लेकिन गरिमा की चमत्कारिक शख़्सियत ने मुझे न केवल परिस्थितियों पर सोचने को बल्कि लिखने को भी मजबूर कर दिया। फिर भी मैं ये नहीं चाहता कि आप उस ताकतवर लड़की के लिए करुणा के भाव लाएं क्योंकि वो एक लौहस्त्री है जो हर कठिनाई को कभी भी उठाकर पटखनी देने की ताकत रखती है। लम्बी-चौड़ी कद काठी की गरिमा चौधरी उत्तर प्रदेश के मेरठ के पास बुलंदशहर नामक जिले की रहने वाली हैं और एक पारम्परिक जाट परिवार से ताल्लुक रखती हैं। गरिमा जूडो की अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं और ब्लैक बेल्ट धारक हैं। गरिमा के बारे में कुछ ख़ास तथ्य भी हैं जैसे गरिमा ने साढ़े तेरह साल की उम्र में वरिष्ठ वर्ग से खेलना शुरू कर दिया था, पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच 14 साल की उम्र में खेला और ओलम्पिक और कॉमनवेल्थ खेलों में गरिमा ने जूडो में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। गरिमा भारत की महान मुक्केबाज मैरी कॉम और पहलवान सुशील कुमार की बहुत अच्छी दोस्त भी हैं।
मैं ये सारे तथ्य आपके सामने इसलिए रख पा रहा हूं कि गरिमा को मैंने भारतीय रेलवे में खड़े होकर सफर करते देखा है। दरअसल, मेरे बिहार से वापसी के सफर के दौरान गरिमा लखनऊ से रेलगाड़ी में सवार हुई थीं और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पटियाला स्थिति कैंप में ट्रेनिंग के लिए जा रही थीं। पहले मुझे लगा कि ये किसी कॉलेज की लड़कियां हैं जो इन्टरकॉलेज कम्पटीशन में भाग लेने को किसी दूसरे शहर जा रहीं हैं। साथ में बैठे भाई साहब के साथ बिहार की राजनीति से चर्चा शुरू हुई जो भ्रष्टाचार से होती हुई कलमाडी और खेलों तक जा पहुंची। मेरे आईपीएल के खिलाफ बोलने पर गरिमा भी बहस में शामिल हो गईं। दरअसल, गरिमा के भीतर एक लावा था जो क्रिकेट और खेलों में व्याप्त भाष्टाचार के नाम पर फूट पड़ा।
गरिमा ने ऐसी बहुत सी बाते कहीं जिन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता। गरिमा के दावों के मजबूत होने का भी एक ठोस कारण है, वो ये है कि गरिमा हमारे उन क्रिकेटरों जैसी नहीं हैं जो हाईस्कूल फेल हैं और टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते हुए करोड़ों में खेल रहे हैं। गरिमा की उम्र अभी भी कम है और वो खेल के साथ पढ़ाई भी करती हैं। गरिमा ग्रेजुएट हैं और आगे भी पढ़ना चाहती हैं। गरिमा के साथ जूडो की एक और खूबसूरत खिलाड़ी से मेरी मुलाकात हुई। इनका नाम नयना बी. पॉल है और ये केरल की रहने वाली हैं। आत्मविश्वास से भरी नयना दिल्ली विश्वविद्यालय के जीसस एंड मैरी कॉलेज से ग्रेजुएट हैं। इन खिलाड़ियों ने जिस आत्मविश्वास के साथ मुझे भारत में खेलों के संचालन और राजनीति के बारे में बताया उसे सुनकर कोई भी कह सकता है कि किसी बेहतरीन अनपढ़ क्रिकेटर से ये लड़कियां कहीं आगे हैं। ये मुझे आधुनिक भारत में नारी शक्ति और सशक्तिकरण की साक्षात प्रतिमा नज़र आ रहीं थी।
व्यक्तिगत रूप से, मैं क्रिकेट तो क्या किसी भी खेल के खिलाफ नहीं हूं लेकिन गरिमा और नयना ने बताया कि किस तरह भारत की अंध क्रिकेट भक्त जनता और राजनीति के कारण उन्हें काबलियत होते हुए भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस बात को साबित करने के लिए दोनों जूडो खिलाड़ियों ने अपना नाम नहीं लिया बल्कि मैरी कॉम और अखिल कुमार का नाम लिया। उनकी दलीलें काफी हद तक ठीक थीं।
जब बात आगे बढ़ी तो मैंने गरिमा से काफी सारे सवाल पूछने शुरू कर दिए। गरिमा ने अपने बारे में काफी सारी ऐसी बातें भी बतायीं जिन्हें सुनकर आपको भी सरकारी नीतियों और नीति नियंताओं पर शर्म आ जाए। ख़ैर सारी बातें तो नहीं कह सकता लेकिन इतना तो आपको पता ही है कि भारत में जूडो की विराट कोहली.... नहीं (सॉरी गरिमा) भारत में जूडो की रफाल नडाल या मैसी या टाइगर वुड्स रेलवे में बिना किसी आरक्षण के खड़े-खड़े सफर करती हैं। शर्मनाक बात तो ये है कि उत्तर प्रदेश की रहने वाली गरिमा ने किसी समय यूपी की टीम से खेलना शुरू किया था लेकिन सरकार की लापरवाही और खिलाड़ियों के प्रति रवैये को देखते हुए गरिमा ने हरियाणा की टीम से खेलना शुरू कर दिया। हालांकि गरिमा का कहना है कि खाने और रहने की सरकार के तरफ से कोई कमी नहीं है लेकिन अगर कोई खिलाड़ी खेलने के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियां भी उठाना चाहता है तो उसके लिए खेलों में कोई मौका नहीं है।
मैंने गरिमा से ये भी जानना चाहा कि ओलम्पिक खेलों में खेलने के बाद क्या उन्हें सरकारी नौकरी मिली? इस पर गरिमा का कहना था कि वे कुछ ही दिन पहले हरियाणा पुलिस का इंटरव्यू देकर आयी हैं। मैंने गरिमा को मुबारकबाद दी और कहा कि अब तो शायद डीएसपी की वर्दी में ही गरिमा से मुलाकात होगी तो गरिमा ने उदास होकर बोला कि उन्हें इन्सपेक्टर की पोस्ट दी जा रही है। यहीं से देखिए कि क्रिकेट और अन्य खेलों में किस प्रकार खिलाड़ियों में विभेद किया जाता है। जहां एक तरफ अशिक्षित या नकल कर पास हुए क्रिकेटरों को डीएसपी या कोई ऊंची पोस्ट दी जाती है वहीं ओलम्पिक खेल चुकी ग्रेजुएट गरिमा को इन्सपेक्टर की पोस्ट से ही संतुष्टी करनी पड़ रही है।
मेरे लिए गरिमा नाम की लड़की एक और चीज़ के लिए महत्वपूर्ण है। गरिमा पारम्परिक जाट परिवार से ताल्लुक रखती हैं और उन्हें खेल में अपने परिवार का पूरा समर्थन हासिल है। गरिमा का कहना है कि जब तक वे खेलों में ज्यादा आगे नहीं बढ़ीं थीं तब उनके आस-पास के लोग उनके माता पिता का मजाक उड़ाते थे लेकिन माता पिता के विश्वास के कारण ही गरिमा आज इतनी ऊंचाइयों तक पहुंच पाई हैं। गरिमा के माता पिता उन लोगों के लिए और खुद ऑनर किलिंग और दकियानूसी विचारों के लिए मशहूर जाट समुदाय के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं जो बेटों के सामने बेटियों को कमतर समझते हैं।
गरिमा ने मुझे पत्रकार समझते हुए ये निवेदन किया कि मैं भी कभी खिलाड़ियों के ऊपर लिखूं और दुनियां को उनकी सच्चाई से रूबरू कराऊं। मैं गरिमा को कोई बड़ा वादा तो न कर सका लेकिन उनके उज्जवल भविष्य की कामना जरूर की। मेरे पत्रकार दोस्त संजय ने गरिमा की खेल भावना को नमन करते हुए अपनी सीट उन्हें दे दी और कुछ घंटों में हम दिल्ली पहुंच गए। गरिमा को मैंने नहीं जगाया क्योंकि मैं उसकी आंखों में पल रहे सपनों को नहीं तोड़ना चाहता लेकिन कई महीनों से चोट से जूझ रही गरिमा के लिए एक बेहतर भविष्य की कामना तो कर ही सकता हूं।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं।

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

शर्मिन्दा हूं मैं!


शर्मिन्दा हूं मैं!
हां, माफ कर दो मुझे, शर्मिन्दा हूं मैं
शर्मिन्दा हूं उसके लिए नहीं, जो ज़ुल्म उन जालिमों ने तुम पर ढहाए थे
बल्कि शर्मिन्दा हूं अपनी उस नामर्दी पर जो तुम्हें बचा न सकी।
याद है मुझे वाक़या उस दिन का
जब तुम काम से थकी घर जा रही थी
मासूम थीं तुम पूरे कपड़ों से ढकी,
लेकिन तब भी दरिन्दों की नजरों से तुम न थीं बची
शर्मिन्दा हूं मैं अपनी उस, उस आवाज़ के लिए
जो तुम्हें न बचा सकी उन वहशी नज़रों से!
याद है मुझे वो दिन
जब राखी खरीदने तुम बाजार में थी,
लेकिन तुम अकेली न थीं उस समाज में,
वहशियों की पूरी भीड़ थी उस बाजार में,
हां, घूर रहे थे तब भी वो तुम्हें
लड़की नहीं एक मांस का टुकड़ा समझे थे,
जिन्दा नहीं हाड़ मांस का एक पुतला समझे थे!
हां, माफ कर दो, शर्मिन्दा हूं मैं
ये सच है, शर्म से गढ़ गया था मैं,
अपने दोस्तों के बीच ही अकेला पड़ गया था मैं।
उनके मन की वहशियत भी समझ गया था मैं,
कलेजा मेरे मुंह में था,
फिर भी जिन्दा होकर मुर्दा ही बना रहा मैं।

हां, ये सच है कि कल रात दो आंसू मैंने भी बहाए थे
जो जख्म तुमने खाए, दिल पर मैंने भी वो पाए थे,
तुम्हारे दर्द से अब ये जान पाया हूं मैं,
शायद अब अपनी खोयी मर्दानगी ढूंढ पाया हूं मैं।
वादा है मेरा तुमसे कि अब रहोगी तुम आजाद,
दरिन्दों को अब बता दूंगा मैं उनकी औकात
शायद फिर भी न दर्द होगा तुम्हारा कम,
शर्मिन्दा हूं मैं मुझे माफ कर देना तुम।
 -नीरज(19/12/2012)
माफ करें लेकिन इस बार आपके विचारों की कोई ज़रूरत नहीं है.....
केवल एक बेहतर भविष्य की उम्मीद है! 

सोमवार, 13 अगस्त 2012

आखिर जनता के लिए विकल्प ही क्या हैं?


टीम अन्ना ने जहां राजनीतिक विकल्प देने की बात कही, वहीं दूसरी ओर योगगुरू रामदेव भी फिर से अपने लाव-लश्कर के साथ दिल्ली में उतर गए हैं। लेकिन कहीं से भी ऐसा एक राजनीतिक संदेश नहीं मिल पा रहा है जिसे आगामी आम चुनाव में जनता विकल्प के रूप में आजमा कर देख सके।

रामलीला मैदान से लेकर संसद तक या फिर सड़क से लेकर घर तक हर आदमी के कुछ सवाल हैं। सवाल हैं लेकिन अभी तक इनके जवाब नहीं आए हैं, तो इन सवालों से एक और सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर इन आंदोलनों का औचित्य ही कहां है।
दरअसल वर्तमान राजनीतिक और आंदोलनों के माहौल में कहीं न कहीं जनता खुद को ठगा सा महसूस कर रही है। टीम अन्ना ने जहां राजनीतिक विकल्प देने की बात कही, वहीं दूसरी ओर योगगुरू रामदेव भी फिर से अपने लाव-लश्कर के साथ दिल्ली में उतर गए हैं। लेकिन कहीं से भी ऐसा एक राजनीतिक संदेश नहीं मिल पा रहा है कि जनता को लगे कि जिस महंगाई और भ्रष्टाचार ने उसकी कमर तोड़ रखी है उसका कोई उपाय निकल सकता है।
सवाल ये भी उठता है कि कहीं आंदोलनों की आड़ में जनता से खिलवाड़ तो नहीं किया जा रहा। शुरुआत से शुरू करते हैं। तहरीर चौक से दुनियाभर में शुरू हुए आंदोलनों के दौर ने आम समाज को एकसाथ उठ खड़े होने का संदेश तो दिया है लेकिन उससे वो परिणाम अभी तक सामने नहीं आए हैं जिनकी उम्मीद हर आंदोलन के शुरू होते समय की जाती है। भारत के माहौल में भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ है। टीम अन्ना ने जब पिछले साल अपना आंदोलन शुरू किया था तब अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठे थे। उनकी मांग थी कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जब तक जन लोकपाल कानून नहीं बन जाता तब तक अनशन जारी रहेगा। लेकिन शायद सरकार ज्यादा मजबूत हो गई और उसने न केवल अनशन तुड़वाया बल्कि ऐसा कोई हवाई कानून भी लागू नहीं किया जिसके लिए अनशन किया गया था। जनता में उस समय एक विश्वास जागा था कि इसी व्यवस्था में एक कानून बन सकता है जो समाज से भ्रष्टाचार को मिटाकर विकास की एक नई इबारत लिखे। लेकिन जनता के अरमानों पर तभी पानी फिर गया जब टीम अन्ना ने राजनीति का रुख लेना शुरू कर दिया। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि आप सत्ताधारी दल का विरोध करते हैं तो कहीं न कहीं विपक्ष का समर्थन भी करते हैं।
लेकिन बात यहीं आकर खत्म नहीं होती। जिस टीम अन्ना को दिल्ली के रामलीला मैदान में एनडीए से लेकर वाम दलों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तक का समर्थन मिला था वो अपार जनता को देखकर बौखला गई और संसद पर ही कीचड़ उछालने लगी। इसे टीम अन्ना का गैर लोकतांत्रिक रुख भी माना गया। नतीजा ये हुआ कि उसने फिर से खुद को पाक-साफ बताने की कोशिश शुरू की। इस कोशिश में राजनीतिक दलों ने तो फिर से संसद का रास्ता पकड़ा ही, संघ ने भी अपने हाथ खींच लिए। टीम अन्ना के राजनीतिक कैंपेन का असर मुंबई में देखने को मिला। हाल में, टीम अन्ना ने फिर से झुकते हुए खुद को पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग लिया है जिससे जनता को यही संदेश गया है कि उम्मीद से भरे एक आंदोलन का अंत हो चुका है।
वहीं दूसरी ओर, पिछले साल रामदेव भी रामलीला मैदान में पहुंचे थे। मुद्दा था विदेशों में जमा काले धन को वापस लाया जाए। रामदेव ने जनता से कहा कि अगर ये धन वापस आ जाए तो भारत फिर से सोने की चिड़िया बन जाएगा। आमजन ने रामदेव के हाथ मजबूत किए लेकिन अंत में सरकार ने फिर से शिंकजा कसते हुए रामदेव को भागने पर मजबूर कर दिया। दूसरी बार अब फिर से रामदेव रामलीला मैदान पहुंचे और इस बार तेवरों और मुद्दों में बहुत बड़ा अंतर देखने को साफ मिल रहा है। अब रामदेव का कहना है कि सीबीआई सरकार के हाथ की कठपुतली है और इसे स्वायत्त किया जाए। हालांकि मुद्दा बहुत पुराना है और समय-समय पर उठाया जाता रहा है लेकिन संशय की स्थिति तब उत्पन्न होती है जबकि रामदेव की कंपनी को चलाने वाले और उसके सीईओ बालकृष्ण पर सीबीआई की जांच चल रही हो और टीम अन्ना का रामदेव के आंदोलन पर ठंडा रुख दिखाया गया हो।
दरअसल इस मुद्दे के भी दो पहलू हैं। पहला ये कि संघ द्वारा टीम अन्ना के आंदोलन से हाथ खींच लेने के बाद उसका असर आंदोलन पर साफ देखा गया और इसीलिए अन्ना के साथ मंच पर आई बीजेपी ने भी इससे दूर रहना ही बेहतर समझा। इस प्रकार टीम अन्ना ने अपनी जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए राजनीति के रास्ते को स्वीकार कर लिया। दूसरा पहलू ये है कि शुरू से ही रामदेव के आंदोलन का समर्थन करने वाले संघ ने फिर से रामदेव के हाथ मजबूत किए हैं और 2014 के आम चुनावों को देखते हुए एनडीए ने भी सरकार की टांग खींचने के लिए रामदेव के आंचल से लटकने में ही भलाई समझी है। लेकिन इससे एक बार फिर से जनता विकल्पहीनता की स्थिति में नजर आती है क्योंकि अगर यूपीए से त्रस्त जनता एनडीए के सिवाय कोई दूसरा रास्ता देखे तो अंधेरा ही नजर आता है। वर्तमान में अगर टीम अन्ना चुनावों में उतर भी जाती है तो तीसरे मोर्चे के कम ही आसार हैं। वहीं दूसरी तरफ एनडीए में भी प्रधानमंत्री के पद को लेकर चल रहा शह और मात का खेल जनता को निराश करता है।
दरअसल इन सारी बातों से अंत में एक ही सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर जनता के पास विकल्प ही क्या हैं। वर्तमान राजनीतिक गठजोड़ों से निराश जनता जब संसद की ओर चलाना शुरू करेगी तो दो रास्ते होंगे। पहला टीम अन्ना की तरफ जाता होगा और दूसरा रामदेव की तरफ। लेकिन जिन्हें खारिज करके जनता इन रास्तों पर चलेगी वो संसद से पहले एक ही सड़क पर जाकर मिल जाते हैं। एक ओर जनता कानून बनाने वाली संसद से निराश है और महंगाई, भ्रष्टाचार से त्रस्त है, दूसरी ओर आंदोलनों के रास्ते पर जाते हुए भी उसे आंदोलनों के नेताओं में वही सत्ता लोलुपता साफ दिखाई दे रही है। तो प्रश्न आखिरकार वहीं आकर खड़ा होता है कि क्या इन आंदोलनों का औचित्य पूरा होता है या इनके होने पर आखिर जनता को कौन सा नया विकल्प मिला है।

एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
 
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं।

सोमवार, 6 अगस्त 2012

भारत की बेटियां नहीं हैं फिजा और गीतिका...

कल अगर ओलंपिक में मैरीकॉम कोई पदक जीत लाए तो वो मणिपुर में रहने वाली एक भारतीय महिला होगी और कई सालों से भूखी मरने वाली इरोम शर्मिला इनके लिए एक देशद्रोही और कानून तोड़ने वाली महिला हो जाती है। 


आज फिजा के मौत की खबर आई और कल ही गीतिका ने मौत को गले लगाया था। कहां है वो भगवाधारी और कहां हैं वो टोपी वाले जो हमारे समाज में लड़कियों और औरतों को समाज में व्यवहार की नसीहत देते हैं। इनमें से कुछ गुण्डे तो ऐसे भी हैं जो सरेआम अपनी मां और बहनों जैसी लड़कियों को न सिर्फ मारते पीटते हैं बल्कि उन्हें नंगा तक कर देते हैं। बहुत पुरानी बात नहीं हुई जब असम में सरेआम एक लड़की को नंगा किया था इन बेशर्मों ने। ये कहते हैं कि हम धर्म और संस्कृति के रक्षक हैं।
क्या हुआ उनका जो सरेआम एक लड़की को नंगा करते हैं? क्या होगा उनका जिनसे एक लड़की प्यार करते हुए न सिर्फ अपना मज़हब छोड़ देती है बल्कि अपने मां-बाप का दिया हुआ नाम तक छोड़ देती है? क्या एक अंधे समाज के विधायक को सजा मिलेगी क्योंकि उसने एक लड़की का इस कदर शोषण किया कि उसने मौत को गले लगाना बेहतर समझा?
शर्मनाक....
कल अगर ओलंपिक में मैरीकॉम कोई पदक जीत लाए तो वो मणिपुर में रहने वाली एक भारतीय महिला होगी और कई सालों से भूखी मरने वाली इरोम शर्मिला इनके लिए एक देशद्रोही और कानून तोड़ने वाली महिला हो जाती है।
कल जब बात होगी तो यही ठेकेदार कहेंगे अरे साहब! छिनाल थी, जीते जी भी अपने परिवार का नाम खराब किया और मर के भी। किसी को क्या दुख होगा ऐसी औरत के मरने का। मैं कहता हूं कि क्या उस औरत का प्रेमी जो पुरूषोत्तम बना बैठा है और जो अपनी बीवी और बच्चों को छोड़ने के बाद भी दोषी नहीं है, उसको सजा नहीं मिलनी चाहिए। अगर छिनाल औरतों को मौत की सजा देना या मरने के लिए मजबूर करना ही इस समाज का दस्तूर है तो उस घटिया आदमी को भी सरेआम मौत के घाट उतार देना चाहिए जो ऐसी किसी महिला को सरेआम नंगा करे या मरने पर मजबूर करे।
दरअसल हमारे समाज की बुनियाद ही ऐसी बनाई गई है जहां महिलाओं के लिए त्रिया चरित्र जैसा घटिया और शर्मनाक शब्द प्रयोग किया गया है। आखिर कब तक अपनी जान की कीमत पर इस समाज में सीताओं को अग्नि परीक्षा देनी होगी? उस समाज में जहां हर पुरूष पुरुषोत्तम बना बैठा हो और औरत पीड़ा की आग में जलती रहे...
अगर ऐसे भारत के सपूतों को गर्व है अपने भारत पर तो गीतिका और फिजा जैसी तमाम बेटियां जो सिर्फ झूठे सम्मान की बलि चढ़ती हैं, भारत की बेटियां नहीं हैं।
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
आपके विचार सहर्ष आमंत्रित हैं। 

रविवार, 3 जून 2012

जनसेवकों के सम्मान में समर्पित



 " हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"


ये हमारे भारतीय संविधान की प्रस्तावना है। खाली समय में मेरे द्वारा लिखी गई किसी भी बकवास को पढ़ने से पहले इसे ध्यान से पूरा जरूर पढ़ें। आप पूछेंगे क्यों? तो उत्तर ये है कि इस प्रस्तावना में भारतीय संविधान का पूरा सार है। इसमें बताया गया है कि आखिर हमारी व्यवस्था कैसे चलेगी। वैसे, देखा जाए तो व्यवस्था तो ऊपर दी गई तारीख 26 नवम्बर, 1949 से ही चल रही है लेकिन जांच पड़ताल में क्या जाता है। दरअसल, ये फालतू बातें दिमाग में तब आईं जब समाचार में पढ़ने को मिला कि भारत सरकार की वित्तीय अवस्था ठीक नहीं है और सरकारी खर्चों को कम करने की कवायद शुरू की जा चुकी है। सवाल एक और था कि सरकार के मुताबिक पिछले कई सालों में देश ने अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति की है, लोगों की आमदनी में बढ़ोत्तरी हुई है, गरीबी कम हुई है तो आखिर सरकार की हालत कैसे पतली हो गई। खैर, इतनी लम्बी आर्थिक बहस में जाने का मेरा कोई इरादा नहीं है क्योंकि मनमोहन सिंह इस देश के प्रधानमंत्री हैं बल्कि मेरी ये बकवास तो जनसेवकों को समर्पित है न कि मेरे जैसे ठलुओं के लिए जो इसे लिखते हैं और फिर उसे दूसरों को पढ़ने के लिए पेश भी करते हैं।
हमारे इस संविधान में ये निर्धारित किया गया कि कौन क्या काम करेगा। जनता को सर्वोपरि रखा गया और उससे कहा गया कि अपनी सेवा के लिए आप सेवक चुनें वो लोकसेवक या जनसेवक होंगे। ये जनसेवक आपके विकास औऱ हितों के लिए काम करेंगे। जनता ने कहा ठीक है, इस व्यवस्था को चलाने के लिए हम टैक्स (कर) देंगे और जनसेवक हमारे विकास के लिए कानून बनाएंगे। इन सभी माननीय जनसेवकों के लिए संसद बनाई गई और वहीं से जनता का भाग्य निर्धारित होना शुरू हो गया। समय बीतता गया और जनसेवक अपनी सेवा में लगे रहे जिससे हमारे देश ने अभूतपूर्व प्रगति की लेकिन जनसेवकों को क्या मिला। चलिए, अब ये जान लेते हैं कि जनता के लिए धन की कमी का रोना रोने वाली सरकार और कानून बनाने वाले बेचारे जनसेवकों को आखिर मिल क्या रहा है।
- बेचारे जनसेवकों (सांसदों) की महीने की पगार केवल 12 हजार रुपये है।, इसके अलावा
- जनसेवकों को कार्यालय के खर्चे के लिए 14 हजार रुपये हर महीने मिलते हैं,
- निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 10 हजार रुपये प्रतिमाह,
- रोजाना की यात्रा का खर्चा,
- रेलवे की प्रथम श्रेणी में साल भर के दौरान अनियमित यात्राएं मुफ्त,
- बिजनेस क्लास में साल भर के दौरान 40 हवाई यात्राएं मुफ्त,
- दो हजार रुपये प्रतिमाह के किराए पर दिल्ली के सबसे महंगे इलाके में आलीशान बंगला,
- हर साल 50 हजार यूनिट मुफ्त बिजली,
- साल भर मुफ्त पानी,
- टी.वी., फ्रिज, सोफा आदि से सुसज्जित बंगले का मुफ्त रखरखाव,
- तीन टेलीफोन नंबर और उन पर साल भर की एक लाख 70 हजार कॉल मुफ्त,
- मुफ्त चिकित्सा सुविधा आदि।
कुल मिलाकर, एक जनसेवक का सालाना खर्च 32 लाख रुपये (2.66 लाख रुपये प्रतिमाह) और इसमें नौकरों और सुरक्षा का खर्च नहीं जोड़ा गया है। इस हिसाब से हमारे 543 जनसेवकों का कुल सालाना खर्च जान लें तो और भी बेहतर होगा। ये है लगभग 868 करोड़ रुपये। बताइये भला, इतने तीव्र प्रगतिशील देश में जनसेवकों की मुफलिसी का ये आलम है। वैसे इस खर्च में देश के सभी सरकारी अधिकारियों (आईएएस से लेकर राज्य कर्मचारियों तक) के खर्च भी जोड़ दिए जाएं तो आपको पता चलेगा कि जनता के विकास में अभूतपूर्व भागीदारी के लिए कितना कम सरकारी खर्च किया जा रहा है। आइये, अब जरा इनकी सेवाओं से जनता का कितना विकास हुआ इसको भी सरसरी नजरों से देख लेते हैं।
सरकार के मुताबिक अगर आप 30 रुपये रोज कमाते हैं तो आप गरीब नहीं हैं। तब भी आधी से ज्यादा जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है, हालांकि सरकार इसे काफी कम बताने का प्रयास करती रहती है। जरा सोचिए जब भारत में इतनी बड़ी जनसंख्या साइकिल पर चलने की भी हैसियत नहीं रखती तो कम से कम जनसेवकों को बिजनेस क्लास में जनता के पैसे पर मुफ्त हवाई यात्रा तो मिलनी ही चाहिए। उस पर भी हमारे देश में भ्रष्टाचार जैसी कोई समस्या नहीं है। जनता के सारे संसाधन उसी की सेवा में समर्पित हैं। इस प्रकार एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य अर्थात भारत की व्यवस्था चलती है।
   
एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ
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