आखिर भारत का समर्थन क्यों करें पड़ौसी देश
भारत को यह समझना चाहिए कि अमेरिका की प्रैग्मेटिज्म पर आधारित नीति कभी उसे भी सवालों के घेरे में खड़ा कर सकती है। सोचिए क्या उस स्थिति में भारत के पक्ष में उसका कोई पड़ौसी खड़ा होगा।
भारत की विदेश नीति हमेशा से ही ढुल मुल रही है। उसी का एक और उदाहरण आज सामने आ गया जब पश्चिमी देशों द्वारा श्रीलंका के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में लाए गए प्रस्ताव का भारत ने समर्थन कर दिया। यह प्रस्ताव श्रीलंका की सरकार द्वारा लिबरेशन टाइगर आफ तमिल ईलम (एलटीटीई) के खिलाफ लड़े गए युद्ध में मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाता है। इस प्रस्ताव का चीन और रूस ने विरोध किया है। भारत सरकार की इस प्रस्ताव का समर्थन करने की एक मजबूरी ये थी कि केंद्र सरकार में सहयोगी दल द्रमुक के प्रमुख करुणानिधि ने सरकार द्वारा इस प्रस्ताव का विरोध किए जाने की स्थिति में अपने मंत्रियों को वापस बुला लेने की धमकी दे रखी थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत द्वारा श्रीलंका के खिलाफ दिए गए वोट को उचित ठहराने की कोशिश में कहा है कि तमिल लोगों को न्याय दिलाने की कोशिश के तहत ये कदम उठाया गया है। क्या वास्तव में बात यहीं खत्म हो जाती है।
क्या विदेश नीति के हिसाब से यही सही कदम था
जो लोग ये कहते हैं कि विदेश नीति के अनुसार यह एक सही कदम था, मैं उनसे सहमत नहीं हो सकता। भारत की शिकायत है कि पड़ौसी देश उसे वो दर्जा नहीं देते जो कि उसे मिलना चाहिए। जबकि सही बात तो यह है कि भारत का रवैया ही पड़ौसी देशों के प्रति बड़प्पन का नहीं रहता। इससे पहले विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ये कह चुके थे कि तमिल लोगों के पुनर्वास और अधिकारों की रक्षा करने के लिए श्रीलंका ने बहुत से कदम उठाए हैं और भारत उनसे संतुष्ट है। फिर ऐसी स्थिति में एक अंतर्रराष्ट्रीय मंच पर श्रीलंका से ये धोखा क्या केवल घरेलू राजनीति को ध्यान में रख कर किया गया। लगता तो ऐसी ही है, ये शर्मनाक बात है कि श्रीलंका के विदेश मंत्री ने भी ये बयान दिया है कि देशों ने वास्तविक स्थिति को न समझते हुए केवल आंतरिक राजनीति के आधार पर इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। देखा जाए तो यह परोक्ष रूप से श्रीलंकाई मंत्री का भारत की ओर इशारा था।
गलत कूटनीतिक का परिचायक
भारत के कई रक्षा विशेषज्ञ और कूटनीतिज्ञ ये बात पहले से कहते रहे हैं कि चीन, भारत के पड़ौसी देशों में पैर जमाता जा रहा है। उन्होंने कई बार सचेत किया है कि ये चीन के मैत्रीपूर्ण संबंध नहीं बल्कि भारत को घेरने के लिए उठाए गए कदमों में से एक हैं। वैसे भी भारत चीन की विस्तारवादी नीतियों से काफी हद तक आशंकित रहता है। पाकिस्तान और नेपाल में पहले ही चीन एक सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुका है। जहां तक श्रीलंका का प्रश्न है, पहले ही चीन वहां पर कई विकास कार्यों में संलग्न है। हम्मनतोता तट के चीन की सहायता से विकास पर भारतीय रक्षा विशेषज्ञ पहले ही कई बार सरकार को चेता चुके हैं कि यह चीन की हिंद महासागर में सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराने की एक कोशिश है। भारत के हालिया कदम के बाद अगर श्रीलंका की नजदीकियां चीन के साथ और बढ़ती हैं तो हमें इस पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर, इस फैसले ने भारत के भी श्रीलंका में किए तमाम विकास कार्यों पर पानी फेर दिया है। भारत ने अपनी कूटनीति के तहत तमिलों के पुनर्वास से लेकर श्रीलंका में रेलवे के विकास तक काफी निवेश किया था लेकिन अब उसके सकारात्मक प्रभाव के बारे में सोचना बेमानी है।
आतंकवाद पर दोहरा रवैया
भारत हमेशा अमेरिका और पाकिस्तान पर आतंकवाद को लेकर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाता रहा है। भारत के हालिया फैसले को किस रूप में देखा जाए यह विचारणीय प्रश्न है। एलटीटीई विश्व का एक कुख्यात आतंकवादी संगठन रहा है। इसने केवल श्रीलंका को ही नहीं बल्कि भारत को भी नुकसान पहुंचाया है। अगर एक बार को तमिल लोगों की भावनाओं का ख्याल कर भी लें वहां तक तो सही है, लेकिन जब एलटीटीई ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की नृशंस हत्या कर दी तब क्या उस स्थिति में भी भारत को श्रीलंकाई तमिल संगठन का समर्थन करना चाहिए। मैं इतिहास की बहस में नहीं पड़ना चाहता कि राजीव गांधी का श्रीलंका में लिया गया फैसला सही था या नहीं। मूल प्रश्न ये है कि क्या एलटीटीई ने भारत में एक भारतीय नेता की इस प्रकार हत्या पर कोई सार्वजनिक अफसोस जताया या माफी मांगी। सही बात तो यह है कि एलटीटीई स्वयं पूरे श्रीलंकाई तमिलों का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। वह सिर्फ श्रीलंका में अपने लाभ के लिए काम कर रहे एक आतंकी संगठन के सिवाय कुछ भी नहीं था।
दूसरे रूप में अगर देखें तो भारत हमेशा वैश्विक मंचों पर ये बात जोर शोर से उठाता रहा है कि सभी देशों को किसी भी रूप में आतंकवाद का समर्थन नहीं करना चाहिए। अमेरिका द्वारा अपनी कूटनीति के लिए पाकिस्तानी आतंकवाद को समर्थन देने पर हमारे भारतीय विचारक काफी आवाज उठाते रहे हैं लेकिन अगर अब भारत सरकार तमिलनाडु के कुछ ऐसे संगठन जो एलटीटीई से नजदीकी रखते हों उनके दबाव में एक लोकतांत्रिक सरकार का विरोध करती है तो यह कहां तक उचित है।
क्या सवाल केवल मानवाधिकारों का है
जो लोग मानवाधिकारों के आधार पर अमेरिका समर्थित इस प्रस्ताव या भारत के इस पर लिए गए निर्णय को सही ठहराते हैं, उन्हें मानवाधिकारों को समूचे विश्व के परिपेक्ष्य में देखना चाहिए। सबसे अधिक हास्यास्पद तथ्य तो यह है कि ये प्रस्ताव ऐसे देशों के द्वारा लाया गया है जो खुद ही मानवाधिकारों का सबसे ज्यादा उल्लंघन करते हैं। अमेरिका अफगानिस्तान से ईराक तक और पाकिस्तान में खुले तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है। दूसरी ओर मान भी लिया जाए कि आतंकवाद के सफाए में श्रीलंकाई सेना ने कुछ मानवाधिकारों का उल्लंघन किया तो ऐसी स्थिति में भारत का सवाल उठाना शोभा नहीं देता। भारत के सशस्त्र बल खुद आतंकवाद और घरेलू अशांति की दुहाई देकर कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक और बिहार से लेकर आंध्र प्रदेश तक मानवाधिकारों का खुल के उल्लंघन करते हैं। ये बात सर्वविदित है कि युद्ध में सदैव मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। भारत को यह समझना चाहिए कि अमेरिका की प्रैग्मेटिज्म पर आधारित नीति कभी उसे भी सवालों के घेरे में खड़ा कर सकती है। सोचिए क्या उस स्थिति में भारत के पक्ष में उसका कोई पड़ौसी खड़ा होगा।
संक्षेप में, भारत को अपनी विदेश नीति के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। हालिया फैसला भारत को हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से कमजोर कर सकता है। देखा जाए तो मालदीव और श्रीलंका हिंद महासागर में भारत के महत्वपूर्ण सहयोगी साबित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में यह विचारणीय है कि भारत को घरेलू राजनीति से प्रभावित न होते हुए अपनी संप्रभुता और नैतिकता के आधार पर विदेश नीति का निर्धारण करना चाहिए।
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नीरज, एक अच्छी विवेचना प्रस्तुत करने के लिए बधाई.
जवाब देंहटाएंयहां पर यह भी कहना चाहूंगा कि यह हमारी विदेश नीति की कुछ हद तक विफलता तो है ही साथ ही भारत की अंदरुनी राजनीति भी इसके लिए जिम्मेदार है. दूसरी तरफ एक पक्ष यह भी है कि श्रीलंका को इस रेसोल्यूशन को गलत परिप्रेक्ष्य में नही देखना चाहिए क्योकि श्रीलंका या किसी दूसरे देश में हो रहा मानवाधिकार हनन केवल उस देश का ही अंदरुनी मामला नही है. यह पहली बार हुआ है जब भारत चीन के इसके पक्ष में वोट देने से दबाव में नही आया.
हमारा यह कदम हमें किस दिशा में लेकर जाता है इसका दारोमदार अब पूरी तरह भारत के कंधो पर होगा कि वह किस प्रकार श्रीलंका के साथ मिलजुल कर स्थानीय तमिलों को न्याय दिलवा पाता है. इसमें कोई दो राय नही की आने वाला समय विदेश कूटनीती के स्तर पर भारत के लिए चुनौतियों वाला होगा.
सुशील यति